बड़प्पन - चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही'

गनिया टमटम उडबले चल जात रहे। टमटम ढकर-ढकर करत रहे। ओकर पार्ट-पूजा बुझात रहे कि अलग-अलग हो जाई। सड़कि उभड़-खाभड़ रहे। टमटम पर बइठल डाक्टर मने-मन अनसात रहन। डांटे के मन करत रहे बाकिर चुप रह जात रहने। जानत रहन कि एकर पुरान आदत ह। कतह रोगी देखे जाये के होखी तब असहीं करेला। कुछ कहला पर कहे लागी 

डाक्टर बाबू रउआ बाहर के हई। इहां के लोग के नईखीं जानत। तनी मनी कुछ हो गईला पर लोग डाक्टर के पास ना जाय। अब-तब के घरी लाग गइला पर लोग डाक्टर के पास जाला। रवे कहां कि अइसन में देरी करे के चाहीं? परान छुटे में का कवनो समय लागेला?" 

आ घोड़ा के चाल आउरोतेज कर दी। जबाब देत ना बनी। भर रहता बकत रही। 

"चल बेटा। हीरा रे। एक जान के सवाल बा। बहुत पुनिहोई। लोग के ओठ पर तोर नांव रही। देख के। गडहा बा। ऊँचा बा। जोर लगा के। बहुत दूध पियले बाड़। आज मलिदा खिआईब। खुदा हो। दया कर रोगी के उमिर द। डाक्टर के हाथ में जस द। तू मालिक हव तोहरे भरोसा बा। गाड़ी से बच के। चल सुग्गा। किनारे से। बच बच के। हाय हाय ईका? अबहिए से थकन? गाँव दूर बा। चाल बढ़ा के। रोगी के बचावे के बा। बेचारा के एके लइका बा। खानदान के दिया बोताय मत। हाय अल्ला! रहम कर। नूर द। परवरदिगार हव। ससुरी हवा बढ़हीं नइखे देत। कइसन गर्मी पड़ रहल बा। लोग रहता से हटते नइखे। सुराज नू हो गइल।" 

जब गनिया घोड़ा के मनावेला तब डाक्टर के बुझाला कि ऊ उनकरे मनावन करत होखे। सुरु-सुरु में उनका ओकर बड़-बड़ाईल खराब लागत रहे। अब उहो पर धेयान ना देस। तबो कबो-कबो ऊ अइसन बात बोलेला कि डाक के हंसी हवा में पंवरे लागेले। 

गनिया स्वभाव के खरा ह। केहु के चुगली करे के हाल ना जाने। डाक्टर ओकरा के अउर टमटम वालन से ज्यादा एह से मानेलन कि ऊ बहुत दिन के अस्पताल के डॉक्टर लोग के चढावत आ रहलबा। चरित्र के अच्छा आदमी ह. 

विश्वासघात करे के हाल ना जाने। कवना समय कहल जाय तड़यार रहेला। कया फुरमाईस ना करे। गांव देहात के लोग ओकरा टमटम के सगुनिया मानेला। बढ़ के लेहाज ओकरा नजर में रहेला। महंगा से महंगा सवारी छोड़ के डाक्य के हे जाय खातिर तइयार रहेला। कवनों गांव के केहू के घर के होखे ओकरा रहता पुठे के ना पड़े। 

गनिया के नजर में रोगी के ना जात होले ना धरम। जवना तेजी से मुसलमान के घर जाला ओही तेजी से इसाई या हिन्दुओं के घर। नांव से मुसलमान होइयों के ऊ हिन्दू ह। ओकरा माई के एगो फकीर पर बड़ी विश्वास रहे। उहे फकीर एकर नांव गनिया रखले रहन। 

"डाक्टर साहब! रउआ भगवान पर विश्वास करीला कि ना?" 

डाक्टर के धेयान टुटल। पहिले त ऊ ओकरा सवाल के ना समझलना फिर से पूछे के चाहत रहन। तब ले खियाल हो गइल। 

"काहे? का बात है?" 

"कुछ ना। असहीं पूछत रहीं।" 

"हम भगवन के मानिला। ढकोसला के ना। एगो अनजान शक्ति के आगा माथा झुकाइला। ओही शक्ति के भगवान मानीला।" 

"ठीक बा। मानी। रउआ मान सकीला। हमा-सुमा के त ढकोसला के मानहीं के पड़ी।" 

डाक्टर के दिमाग गनिया के बात के साथ कदम से कदम मिला के ना चल सकल। मन में पूछ के समझ लेवे के लहर आईल। एगो बड़प्पन के चादर ओढ़ ली रहन। ऊ घशात बुझाइल। टाई ठीक कइले। कोट पैंट पर के धुर रुमाल 1. से उड़वले। मुँह पर रुमाल गते-गते चलावे लगले। मन में कुदार चलत रहे। अपना के ना रोक सकले- "काहे?" 

गनियो आदमी ह। सब केहू अपना के सबके से बड़ समझेला। हाथी या कार पर चढ़े वाला लोग साइकिलिहन के हटत देख के हंसेला। हमरो से बड़ लोग दुनियाँ में बा, ई भुला जाला; बाकिर अपना से छोट न नांव अंगुरिये पर रहेला। डाक्टर के दिमाग में अपना बात के ना पकड़ात देख के गनियों के खुशी भइल। ऊ खंखार के गला साफ कइलस आ कहे लागल "केहू कहे कि मिठास होले। सभे कही ऊ कइसन होले? मीठ लागे से मिठास ह। रउआ मान लेब। हमरा दिमाग में ना धसीं केहू मिसरी खिआ के कही कि अइसन लागत बा उहे मिठास है। हम मान लेब।" 

गनिया चुप हो गइल। डाक्टर के डर लागे लागल। ऊ गनिया के एक सवाल से डालना ऊ जब पुछेला कि बबुआ लोग कब आई मेम साहब कब आइब, ठब सांच बोले के साहस ना पड़े आ झूठ बोले के पड़़ेला। 

आजो उनका बड़का लइका के चिट्ठी आइल रहे। लिखले रहे कि बेबी जाये खातिर रोवेले। ओकरा के पढते बुझ गइल रहीं कि उनकरे लिखावल होई। आगे अठरी साफ लिखल रहे कि छुट्टी मिली तब चल अइह चाहे केहु के भेज दीह नात माई बरखा शुरु होते चल आई। 

अइसन बात ना रहे कि ऊ ले आइल ना चाहत होखस। कवनो तकलीफ ना होखे, कवनो खर्चा कम होखे, कवनो अपना औरत से प्यार ना होखे, घर के लोग रोकत होखस, सेहू बात ना रहे। सोचत रहन कि ई लोग भा रही तब खुब लिखाइत। अब बुझात बा कि ओही समय ढेर लिखात रहे। 

"हजुर रात दू-तीन गो हितलोग आ गइल रहन। दाल-चाउर सब राते में साफ हो गइल रहे। अब लौटब तब खरीदाई। घर में पइसो नइखे मिलवे का करेला कि बांचो? महंगी जान मरले बिया।" 

डाक्टर छूटकारा मिलल देख के अपना के हलुक महसुस कइले बलाय टर गइल रहे। दोसर केहु कहित तव विसवास ना करितन सोचितन कि कुछ मांगे खातिर बहाना कर रहल बा। गनिया पर विश्वास हो गइल। ऊ मांग के कुछ ना ले सके। 

"तब अनगुते से असहीं बाड़?" 

"आवत खा नथुन साह के दोकान पर चाय पी लेले रहीं । नथुन साह के जानीला नू? अस्पताल के पास उत्तर तरफ दोकान बा बेचारा गरीब आदमी ह। दिल के खराब ना ह। हमरा साथ पढ़त रहे। मयभा मतारी के चलते ओकर ई हाल भइल बा ना त ओकरा कवना चीज के कमी हइस।" 

टमटम के रुकते लइका घेर लेले सन। उतर के डाक्टर सीधे रोगी के पास गइले। बक्सा लेले पीछे-पीछे गनिया रहे। डाक्टर के चपरासी टमटम के पास रह गइल रहे। रोगी के खाटी के दाहिने ओर एगो कुर्सी पर डाक्टर बइठ गइले। गनिया खाटी के सिरहाना बायीं ओर जा के खाड़ा हो गइल। डाक्टर रोगी के कलाई देखते रहन आ गनिया उनकर चेहरा। ओकरा चेहरा पर उभरत भाव के ऊ पढ़ के समझ गईल। डाक्टर लोगन के साथे रहत-रहत बहुत कुछ जाने लागल रहे। 

"सुसुम पानी चाहीं। जल्दी। हालत ठीक नइखे। गर्मी खातिर सुई देवे के पड़ी।" रोगी के छाती पर आला धुमा के डाक्टर बोलले। 

सुसुम पानी तइयार रहे। तइयार ना करें पड़ल। जल्दीए मिल गइल। रोगी के दहिना हाथ डाक्टर के आगा उधार पड़ल रहे। उनका हाथ में सूई रहे। एक हाथ में स्पिरिट में भीजल रूई के फाहा रहे। साहस ना होत रहे कि सूई देस। मन संस्कार मुर्दा के खोभे से मना करत रहे। गनिया के तरफ देखलन। ओकरा नजर में घरवा भरल रहे। ऊ दरवाजा तरफ बढ़ल। डाक्टर के बुझाइल जइसे कि ऊ उनका जइसन पापी के हत्या करे खातिर हथियार ले आवे गइल होखे। रोगी मर गइल एड में हमार का दोष? हमरा पास लोग गइल तब हम अइबे कइनी। तनिको देरियो ना कइनी। हम त आइल बानी। हमार समय लागल। हमरा त फीस मिलहीं के चाहों कह देब कि मर गइलन तक के फीस दी? लोग रोवे-गावे लागी। वाबूजी के मुकदमा खातिर, करज चुकावे खातिर रूपया चाहीं। भाई के कॉलेज के फीस चाहीं। लइकी के 8-10 साल बाद भारी तिलक चाही भावुक बनला पर कहां से आई? हाथ प स्पिरिट मलत देर भ गइल मन कड़ा कर के आंख मूंद के सूई धंसा देले। 

दवा के पूर्जा थम्हा के खियावे पिआवे के तरीका बता कं. फोस चेटिअवलन आ आके टमटम पर बइठ रहलना गनिया से नजर मिलते झुका लेलन आ दोसरा ओर देखे लगलन। 

डाक्टर के बइठ गइला पर गनिया टमटम बढ़ा देलस। लोग के तरफ देख के हाथ जोड़ के बोलल, "तब हम जात बानी।" 

एक आदमी घोड़ा के तरफ बढ़ल। हाथ में हरियर पांच रुपया के नोट रहे। 

"अपना टमटम के भाड़ा ले ले जा।" गनिया सुन के अनसुना कर देलस। घोड़ा के चाभुक मार देलस। हाथ के इसारा से बतवलस कि भाड़ा ना चाहीं। 

घोड़ा पर के चाभुक डाक्टर के अपना पीठ पर महसुस भइल। ऊ देखलन गनिया के आँख से झरझर लोर बहत रहे। ऊ ओकरा बड़प्पन के ऊँचाई देखें लगलन।
------------------------------------
भोजपुरी कहानियां, वाराणसी जुलाई - 1969

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.