तारकेश्वर राय 'तारक' के लघुकथा

जीव के हत्या

हमरा गाँव के दखिन सिवान के महंगू अहीर के डेरा के २० लठ्ठा दूर एगो बाबाजी लोग के गाँव बा महुवारी । ओह गाँव में बड़ा धार्मिक बिचार के लोग रहेला । जीव हत्या के जघन्य पाप समझेला ई गाँव । आजुले कवनो जीव हत्या भइल होइ कोई के इयाद नइखे । काहें की सउँसे गाँव जीव के आपन घर परिवार के सवांग नियर मानत रहे । 

एक दिन फजीरे बजरंगी पांडे के छोटका नाती महंगू के आवाज सुनाइल "धउरजा हो एगो आदमी बरम बाबा तर हरीना मार देले बा" 

इ सुनी के गाँव के कुल्हिये नौछेटीहा हाँथ में गोन्जी ले के बरम बाबा की और दौड़ पड़लन । जा के देखलन की, एगो आदमी के गाँव के कुल्हिये लइका मिलके पकड़ले बाण स । सामने मुवल हरीना जमीन पर पड़ल बा । इ देख के सभकर खून खौल गइल । जेकरा हाँथ जवन लागल ओहिसे ओह आदमी के धुनें लागल । उ हाँथ जोड़ी के सबसे रहम के भीख माँगत सुनाइल आ जान बख्स देवे के गोहर भी लगावत सुनाइल । 

लेकिंग भीड़ कहाँ सुने वाली रहे। हं , बिच बिच में भीड़ में से इ आवाज जरूर सुनाइल "आजु तक ले एह गाँव में जीव हत्या ना भइल रहल ह, जीव हत्या कइके तू हमनीके गाँव के परम्परा के तोड़ी देले बाले ।" 

भीड़ उकसवलस "छोड़ला के काम नइखे एके सजा देहल जरूरी बा, इ एगो जीव के हत्यारा ह, इ हमनीके गाँव के पुरखन से चलल आ रहल परम्परा के तोडले बा " 

भीड़ के आगे एगो निहथ्था आदमी कबले बाँचीत, तड़प तड़प के प्राण निकल गइल । 
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संस्कार

सावित्री भउजी बड़ी खुश बाड़ी। आखिर खुश काहें ना रहीहन? आजु उनकर छोटकी ननद के बियाह ह। बियाह बनारस के होटल से होता। एहिजा चूल्हा-चउका से छुट्टी त बड़ले बा, कुछउ करहूँ के नइखे। खलिहे सज-सँवर के, गलचउरन क के समय बितावे के बा, किसिम-किसिम के पकवान बा से अलगे। सभे बड़ी खुश बा एह नवका रिवाज से। 

आजु सबकर नजर सावित्री भउजी पर से हटते नइखे। हर अदिमी उनकर नवका रूप के देख के अचरज में बा। हरमेसे चोटी बन्हले, कपारे लुग्गा राखि के साधारण साज-सँवार में रहे वाली भउजी आज कजराही आँख अउरी सुन्नर मेकअप में, कान्हे अधपल्लू रखले बहुते फबत रहली, सभकर कहनाम ईहे रहे। बरिसहन बाद भउजियो आपन रूप के बड़वागी सुनि के मारे खुशी के उड़त रहली। 

तब ले बबलुआ धउरल आइल आ कहलस - "मम्मी, मम्मी, बाबा आवताड़न।" बबलुवा के ई ड्यूटी रहल ह कि बाबा के आवते जेतना हाली हो सके, मम्मी के एकर सूचना दे जाय।

भउजी सोचली कि बरिसहन बाद, हजारन रोपेया खरचा कइला पऽ, बड़ा भाग से ई मोका मिलल बा त ई सुन्नर रूप भेटाइल बा। ऊ दूसर गोतिनिन का सङ्हे बतियावे में बाझे के बहाने बबलुवआ के बात के अनसुन कइ दिहली। बबलुओ देखलस कि मम्मी सुनत नइखी त दूसर लइकन का सङ्हे खेले में बाझ गइल। 

पीछे ठाड़ बाबुओजी ना देखे के बहाना कइलन। त'ले टाटावाली फुआ के ई सब लउकल। ऊ भउजी के रूप देख के कहली- "अरे सावित्री, आज तू त बहुते सुन्नर लागत बाड़ू । केशो बड़ा नीक बन्हाइल बा, बाकिर तोहरो बार अब पाके लागल दुलहिन।" अतिना कहते फुआ आगे का ओरि सरक गइली। फुआ के बात सुनते भउजी के चेहरा पर चिंता के रेख उभरि आइल। ऊ जल्दी-जल्दी वॉशरूम का ओरि बढ़ गइली। जा के शीशा में आपन रूप निहरली आ देखली कि फुआजी ठीके कहत रहली हँ । 

बाबुजी देखलन, सावित्री भउजी कपारे लुग्गा रखले वॉशरूम से बहरी निकलत रहली। ऊ निकलते बाबूजी का ओरि बढ़ गइली आ कहली- "ओह् बाबुजी? रउआ कब अइनी हँ ?" 
ऊ बाबूजी का गोड़ छुवे ख़ातिर झुक गइल रहली।

बाबुजी मुस्कियात सोचे लगलन, संस्कार त कपार प लुग्गा ना रखवा पवलस बाकिर एगो अधपक बार केतना बरियार काज क गइल जे सरकत लुग्गा फेरु खुशी-खुशी माथे जा चढ़ल। ऊ सावित्री भउजी के चेहरा पर आवत-जात रंग के बाँचे के कोशिश करे लगलन । 
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ऊ दिन 

बासगीत बाबा के रिटायर भइले एगो जुग बीत गइल बाकिर आजु ले उनकर दिनचर्या में कवनो बदलाव ना भइल। होत भिनुसहरे बिस्तर छोड़ देना अउरी नित्यकर्म से निबट के अखबार भा कवनो पुरान किताब ले के ओसारी में कुरसी पर बइठ जाना उनकर रोज के दिनचर्या में शुमार रहे। हेह उमिर में पढ़े ख़ातिर चश्मा त निहायत जरूरी चीज ह आ ऊ आजु कहाँ धरा गइल, सुरुता नइखे परत। एहीसे बाबा बेचैनी से कबो खटिया त कबो बिस्तरा उकट-पकट के धइले रहलन। सभ सवांग आपन-आपन काम में बाझल रहन, के पूछऽता कि बुढ़ऊ का खोजत बाड़े ? ई सोचत खने बाबा क आपन पुरान समय इयाद पड़ल जब ऊ हर महिने नोटन के गड्डी ले के घरे आवस । उनकरा मुहँ से आवाज निकले भ के देर होखे- "अरे हमार चश्मा? मिलत नइखे ?" एके सङ्गे कइगो आवाज सुने के मिले- "ए जी रउआ रुकीं हम देखऽ तानी।" 

"बाबूजी हम देखतानी।" 

"ए बाबा, हेइजा बा राउर चश्मा।" भर-घर के कोने-सानी से अलग-अलग आवृति के आवाज सगरे पसरे लागे। 

आजुओ बात त ओसनके रहे। मोबाइल पर ख़ुबुर-ख़ुबुर अँगुरी चलावत, इसक्रीन पर नजर गड़वले सीमा फुआ के छोटका लइका बनटिया पूछि लिहलस- "का भुला गइल बा ये नाना ?"

बाबा के खीसी बर्हमंड झोंकर गइल - "आपन पुरनका समय के खोजतानी ए नाती।" 

पता न बनटिया सुनलस कि नाहीं बाकिर बोलल- "ए नाना, बइठs आराम से। खटपट बंद करऽ। एह उमिर में भुलाइल चीज के मिलल मोसकिल बा। सुनले नइखs का? 'गइल जवानी फिर ना लवटे, कतनो घीव मलीदा खाव।' बाकिर राउर भुलाइल का बा ?" 

"चश्मा हो। सुरुते नइखे परत, कहवाँ धऽ दिहनीं।"- बाबा कहलन। 

"बै नाना, कहेला न? ऊ त हउका ओसारी में कुरसी आ चश्मा धऽ देले बानीं।" - बनटिया कहलस। 
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लेखक परिचय:-
सम्प्रति: उप सम्पादक - सिरिजन (भोजपुरी) तिमाही ई-पत्रिका
गुरुग्राम: हरियाणा 







मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

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