बबुआ के जनम भइलें हो - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

अन्हिया मे उड़ल छन्हियाँ, बनल कहानियाँ
कि बबुआ के जनम भइलें हो॥

अरे हो घरे आइल आपन निसनिया
कि चनवा उतरि अइलें हो॥

काटे धउरे चाँन क चननिया, नाक के नथनिया
कि दुवरे के पलनिया हो॥

अरे हो करकेले कमर करधनिया
कि बबुआ स्रिंगार भइलें हो॥ 

सासू मोरी मटिया जगावेली,सभके बोलावेली,
जबरी जिमावेली हो॥

अरे हो हँसी-हँसी लोरिया सुनावेली
कि ललनवा दुलरावेली हो॥
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लेखक परिचय:-
इंजीनियरिंग स्नातक;
व्यवसाय: कम्पुटर सर्विस सेवा
सी -39 , सेक्टर – 3;
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