पहाड़ में भोर - दिनेश पाण्डेय

मेहधुईं पीठ पर भरल, 
चँगुरा में गाँव-घर धरल, 
या कि नीन में भरल गरूड़ अस
सुत रहल पहाड़ झुरमुटन तरे। 
नदी के धार में असंख आसमाँ तरे।

पात-आतपात माथ धर, 
रहि-रहि के तन रहल सिहर। 

बबरी में अझुरवले बर्फ धूरि
ठाढ़ चीड़ के बिरिछ ढलान में, 
कथी त कह रहले साँवरी के कान में।

पुरबाहुत ओत से निकल
ताक रहलि भोर कुछ बिकल।
सूरुज के बेन्दुली लिलार प?
टुप् दनी उजास अस पसर गइल। 
करियकी छाँहि कहीं आन्ह में ससर गइल।

ऐन खड्ड के कगार लग
इकलौता घर बनल सुभग,
तिरछौहीं-आड़ी सुरेख में, 
छितिज के किरमिच पे तिर दिहलस।
चितेरा पाछ में रंग कुछ गहिर लिहलस।
(शब्दार्थ - मेघधुईं- मेघधूम। चँगुरा- चंगुल। आतपात- आतपत्र, छतरी। बबरी- जुल्फ। पुरबाहुत - पूरब ओर। ओत- ओट। बेन्दुली--बिन्दी। किरमिच- कैनवस।)
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लेखक परिचय:-
नाम - दिनेश पाण्डेय
जन्म तिथि - १५.१०.१९६२
शिक्षा - स्नातकोत्तर
संप्रति - बिहार सचिवालय सेवा
पता - आ. सं. १००/४००, रोड नं. २, राजवंशीनगर, पटना, ८०००२३

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