एकांत के आलाप - दिनेश पाण्डेय

अनबूझे रहल राधा,
जमुना कगरी के 
ऊ मिलन पहिलकी,
पैबस्त बा ओसहीं
अजुओ ले जेहन में
चनन खौरी, रेख रोरी,
दमकत मुख अउ शोख मिरिगा आँखि।

कुछ अँखुवा उग आइलि
ऊसर जमीन में,
कोने-अँतरे से,
जिनिगी के अँउज-पथार से।

अतल अन्हियार से 
बरल रहे कनो जोत
पहिली बेरि।

दुधमुँहे से जुवापन तक
कति अवस्था, कति दशा के फूटन,
हर पुलक प आँखि में उपजल, खखन, 
फिकिर, उदासी, खोबस, 
मन के परगट हुलास, हरख-बिखाद, 
भाव अनगिन
काल के परिहास।
हमरा बदे प्रेम अनजाना तबो रहल।

ना जनलीं,
माई-बाप के दुलार,
सहोदर इरिखा, तकरार में पेहम प्यार।

मयार नंद-जसोदा के आँखि में 
हरमेसे नजर आइल 
बाना धइले दयाभाव अथाह।

लरिकपन के सरबस पाजीपन क सोरि
ई दयाभाव ही रहल राधे,
चोरी, बरजोरी, हँड़िफोरी
सभ खुटचालन के पीछे के इहे कहनी।

कतिनो चहनी 
टूटे छद्म बछल के, 
दुलार के
ललसे रहि गइल, चेहरा प रोस,
दयाभाव-उघार के दिदार के।
कवन माटी के रहलन दुन्नोजन
भाव गोपन के हठी साधक।
चाहत अपूरन रहि गइल
बाकिर मन के का?
ओह अहसास के का?
जे हरमेसे बनल रहल आसपास,
नन्दगाँव में,
बरसाना में,
सगरे बिरज में,
जमुना के कछारे,
गाछ-बिरछ के छाँव में,
गइयन के तरहत्थी चटले निपजल
खुरदरी गुदगुदी में।

एक तुहें त रहलू राधे
जेकर मौजूदगी में कुछ अउरि बात रहे,
तोहर रूप-रंग, देह-गंध, परस, सबद सभ
सिसिर-अगन लहकावल 
समूचे वजूद में,
माटी, पानी, आग, हवा, अकास में
सगरे तूँही त रहलू
नीमन-जबून में,
खाक-बिहूद में,
हमार हम लोपित भ गइल कहर्इं
अमव्सा के चान अस।
एहि तिरन के का नाँव दिहल जाव?
सबद-बंध से परे।

एहिके बान्हे के हर जतन कइले 
छहल जाला,
हर भेव क अंत इहवाँ।

सबद त रूप के, अरूप के परगटन क जरिया ह
दुनो से आन के र्इ का छानी?
पानी में लहर कि लहर में पानी?
बानी में अरथ कि अरथ में बानी?
अइसन चीझ के कउची कहल जाला?
हम तोहसे बिलग कब रहनीं राधे?
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लेखक परिचय:-
नाम - दिनेश पाण्डेय
जन्म तिथि - १५.१०.१९६२
शिक्षा - स्नातकोत्तर
संप्रति - बिहार सचिवालय सेवा
पता - आ. सं. १००/४००, रोड नं. २, राजवंशीनगर, पटना, ८०००२३

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