ओम शांति - डॉ. हरेश्वर राय

अबकी के फागुन में, इ कइसन हवा चल गइल
मछरी के मिलल रेत, तितली के पाँख जल गइल।

अनगुत डरल सहमल, दिन औंघाइल अस
साँझ के सुहानापन, कंदील नियर गल गइल।

लाल रंग टेसूअन के, फाट के कपास रंग भइल
फूलन के छाती में, ओला के तीर हल गइल।

फाग के किताबन पर, दिअँकन के राज बा भइल
आमन के मोजर पर, लाहीन के रंग डल गइल।

शहादत पर सियासत के, घटिया सा खेल चल रहल
ओम शांति के छाती पर, आतंक आके मुंग दल गइल।
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लेखक परिचय:-
प्रोफेसर (इंग्लिश) शासकीय पी.जी. महाविद्यालय सतना, मध्यप्रदेश
बी-37, सिटी होम्स कालोनी, जवाहरनगर सतना, म.प्र.,
मो नं: 9425887079
royhareshwarroy@gmail.com

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