प्रशंसा पत्र के धउस - डा उमेशजी ओझा

मोनी जब बिआह कs के आपन ससुराल अईली, त उनकर हालत कउवा झपट्टा वाला रहे. आपन तन आ मन के खेयाल करत सोचे लगली कि का अईसने ससुराल होला.? मोनी ससुराल आवते देखली कि उनकर सास के गज भर के थथुना लटकल बा. दहेज़ खातिर , ताना देबे आ सुन्दरता में कमी निकाले में उच्च कोटि के खेलाडी रहली. चारगो बेटा के माई होखे के आ आपन पतिदेव के आँखी के भगजोगनी होखे के उनकर गुमानो कम ना रहे. मोनी, बड़हन ससुराल होखे आ घर के बड पतोह होखे के चलते घर के सभ लोग के हँसी के नायक भी रहली. सभ केहू उनका से हँसी मज्जाक भी करत रहे लोग. जब कबो आपन पति परमेश्वर से उ सब के खिझिआवल बात कहस त उ उलटे मोनी के समझा देस कि “ ई सभ तु का मथले बाडू, अरे तु पढ़ल, लिखल, बी.ए. पास बाडू , तहरा सोचे के चाहि तहरा तिनगो देवर बाडन आ घर के बड पतोह सभके दुलारी बाडू , तनिआसा त हंसी मज्जाक होखबे करी.” आपन पति के अईसन बात सुनिके मोनी के आपन पढ़ला लिखला प खीझ आवत रहे. ओहिजा उनका खातिर केहू भगवान् श्री कृष्ण बनेवाला ना रहे. धीरे-धीरे उनका आपन छोट देवर पुष्कर से तनियासा नजदीकी बढ़ गईल. दुनो मौक़ा मिलला प एके साथे बईठके आपन दुःख तकलीफ बतिआवत रहस. मोनी आपन देवर पुष्कर के आपन जिव जान से मानत रहली .

कुछुये दिन में पुष्कर के नोकरी एगो कारखाना में लाग गईल. पुष्कर के नोकरी प गईला के बाद मोनी के ससुराल के लोग खोजी खोजी के ताना दिहल शुरू कईले. जे कबो पुष्कर के भला बुरा कहले होखे , उ ना जाने कहाँ कहाँ से कवन बात उघार के वार करत रहे ओकरा के समझल मुस्किल हो गईल रहे. 

नोकरी प जाते पुष्कर के विआह खातिर अगुआ आवे लागल रहे लोग. जब केहू उनका घर के उनका से लइकी देखे के कहत रहे तब उ कहत रहले कि मोनी भउजी ही उनका खातिर लईकी पसंद करिहे. उनके पसंद से उनकर विआह होई. 

पुष्कर जब छुटी प अईले तब उनका खातिर घर के सभ केहू लईकी देखे गईल. मोनी भी साथे रहली. देखे में लईकी , ठिगनी, साधारण रंग रूप के, बोली त एकदम कउआ निहन करकस रहे. अगल बगल से मालुम कईला प पत्ता चलल कि उ स्वभाव के ठीक ना हई. उ कवनो कोना से पसंद करे लायक ना रही. 

घरे आके सभ केहू चाय के टेबुल पर बईठल चाय के चुस्की लेत, लईकी के स्वभाव आ बाकी सभ प विचार करे लागल लोग. ओने पुष्कर दु चार दिन तकले बड़ी उदास रहस. कुछ दिन बाद मधुमाछी जईसे फूल के चारो ओर घुमेलिस ओसहि पुष्कर आपन मोनी भउजी के घेरे लगले. 

मोनी, “ का बात बा देवर जी.”? 

“भउजी , जब हमनी के लईकी देख के लउटत रहिजा , त ओकरा आँखी में अलग तरह के उदासी लउकल हs . जईसे उ बोलत होखे कि “हम सुनर नईखी त ओह में हमार का दोश बा.” ? 

मोनी समझवली, “देखि देवर जी, शादी विआह रोज-रोज ना होला ? देखनी ह रउरा से तनिओसा रंग रूप मिलत रहल ह.”? 

“ भउजी, ना जाने ओकरा से हमार लगाव बढ़ल जात बा. अब त विआह करब त ओकरे से ना त केहू से ना.” 

जब मोनी , पुष्कर के बात आपन सास आ पति से बतवली त दुनो माई बेटा मोनिए प आपन खीझ उतारल शुरू कईल लोग, कहे लागल लोग कि, “तहरे सभ ई साजिस बा, तुही नईखु चाहत कि तहरा से केहू सुनर एह घर में आवे.” ओकरा बाद मोनी के भी पुष्कर के जाल में शामिल समझल जाए लागल. 

माला, पुष्कर के पत्नी बनके आ गईली. माला के गजब के नजर रहल. ससुराल में आवते कुकुर के नाक लिहले सभ केहू के सुंघल शुरू कs दिहली. ई जाने के कोशिश करे लगली कि उनकर पति के सबसे ढेर केकरा से नजदीकी बा. सबसे पहिले आपन सास के घेरल शुरू कईली. 

अबही माला के अईला दु चार दिन ही भईल रहे कि घर के सबसे बड होखे के चलते, मोनी अपना सास के साथे साथ , माला के नईहर से मिलल सामान के देखत रहे लोग. उ लोग आपस में माला के नईहर से मिलल सब साडी के सस्ता आ कमजोर कहत रहे लोग. मोनी के सास आपन बेटा के मोह में परी के उनका से ना कुछ कहली, बाकी आपन उदासी माला से जाहिर कईली. एह प माला रोवल धोवल शुरू का दिहली. आ तब तकले चुप ना लगवली जब तकले कि उ आपन नईहर ना चल गईली. 

पुष्कर भी दु चार दिन तकले माला से आ आपन अवरु भउजी से कुछो ना बोलले, कुछ दिन बाद उहो आपन ससुरारी जा के रहे लगले. एह प जब पुष्कर के माई, पुष्कर से कहली कि माला एहिजे काहे नईखी रहत ? 

पुष्कर,” माला के जईसन रहन सहन में रहे के आदत बा उ एहिजा नईखे. एह से उनका के एहिजा रहे के जिद कईल बेकार बा.” 

“ काहे, बेटा, तहार भउजीओ त बी०ए० पास बाड़ी, बड घर के लईकी, उ एहिजा रहत बाड़ी .?” 

“ मोनी, आपन सास के अइसन बात सुनिके उनका कान आ मगज के ठंढई मिलल, आजू उनका आपन पढाई प गुमान होत रहे. 

कुछे दिन बाद पुष्कर आपन दुलारी पत्नी माला के आपना साथे लेके चल गईले. थोड़े दिन में पुष्कर के लिखल एगो चिठी पुष्कर के माई के मिलल जवना में लिखल रहे कि माला माई बनेवाला बाड़ी. माई एहिजा आ जईती त बढ़िया होईत. चिठी मिलते घर में हवा बदल गईल, ख़ुशी के वातावरण छा गईल. बाकी ई ख़ुशी जादा दिन तकले ना टिक पावल. फेरु चिठी आईल कि माई के एहिजा आवे के जरुरत नईखे, एगो नोकरानी मिल गईल बिया. जवन संभाल लिहे, चिठी पढ़ के घर के सभ लोग उदास हो गईल. सोच में सभे पड़ी गईल कि पुष्करवा पगला गईल बा, माई के नोकरानी, आ नोकरानी के माई से तउलत बा. 

सभ केहू ईहे सोचत रहे कि देखs, पूत कपूत हो सकत बा, बाकी माता कोबो कुमाता नईखे हो सकत. समय के पहिया चलत रहल, एक समय आईल कि पुष्कर के विदेश जायेके पडल. ओह बिच में उ आपन माई के ले जाके माला के लगे छोड़ दिहले कि दुनो साथे रही लोग आ दुनो के मन भी लगत रही. पुष्कर के जाते माला आपन सास के आपन घर के कोना वाला घर रहेके दे दिहली. उनका के आपन घर में आवे जाए से माना क दिहली. ख़ास कs के जब उनकर सहेली लोग आवत रहली. जब उनकर मन चाहत रहे कि आपन पोता के आपना लगे लेके सुतिती त माला उनका के खरी खोटी सूना देत रही. मोनी के सास के ओहिजा तनिओसा मन ना लागत रहे. तबहुओ ओहिजा एक वरिश रह गईली. माला के ना त आपन बेटा के आ ना सास के कवनो चिंता रहे. खाली उ समाज सेवा में लागल रहत रहली. एही बिच में मोनी के बेटा सुकांत आपन नोकरी के परीक्षा देबे खातिर दिल्ही गईले त आपन इआ {दादी} के देखे खातिर आपन चाचा के घरे चली गईले. सुकांता के देखि के मोनी के सास के बुझाईल कि ,” डूबत के तिनका के सहारा मिल गईल.” उ आपन मन ना लागे के बहांना कके सुकांता के साथे घरे आ गईली. घरे अईला प उनकर कमजोर हालत आ उदास मुंह देखि के माला के उपेक्षा के अंदाजा लगावत देर ना लागल. उ आवते सभ केहू प पड गईली. कहे लगली कि, “ सब केहू प भारी हो गईल रहनी ह , तबही नु केहू उनकर सुध तक ना लिहल ह, कि, चल कसहु बलाई टललि, अगर असही सभ केहू समझत बा त कही मरी खप जईती त केकरो पत्तो ना चलीत .” 

अब आखिरी वीर मोनी ही रहली, अबकी हाली आपन पति के साथे मोनी दिल्ली गईली त पुष्कर किहे ठहरली. सबेरे सबेरे मोनी के पति रमेश आपन काम से निकल गईल रहले. दुपहर में खाना के टेबुल प एक ओरी माला आ पुष्कर एक ओरी मोनी बईठल रहे लोग. माला आपन सोचल समझल साजिस से बोलल शुरू कईली, कि, सास त आपन साचल , सभ बचावल खजाना तीनो पतोही प लुटा देले बाड़ी, उनका त कुछुओ ना मिलल. 

मोनी, पुष्कर, रउरा नईखी जानत कि माई के लगे एगो फूटी कउडी नईखे, “ पुष्कर एक दुहाली बोले के कोशिश कईले बाकी माला कुछ ना सुनली त पुष्कर चुप हो गईले. माला कहिया कहिया के गाडल मुरदा उखाड़त चलल जात रही. आ बिच बिच में रोअत जात रही. माला , मोनी के बाही पकड़ के आपन कमरा में ले जाके कहली, देखि रउरा सभे कहेनी कि हम घर नईखी संभाल सकत. हमारा भीतरी सेवा भावना नईखे. “देखि, लोग हमरा के कतना प्रशंसा पत्र मिलल बा. आजू तकले रउरा सभे के अईसन प्रशंसा पत्र मिलल बा ? हम त केहू से सम्बन्ध ना राखल चाहत रही, बाकी रउरे सभे एहिजा आवा जाहि रखले बानी. हमनी के तीनो परिवार एहिजा खुश बानी जा,” माला के बात सुनत सुनत मोनी के कान पाकी गईल रहे. आखिर बर्दास्त के भी कवनो सीमा होला. 

मोनी, माला के धिक्कारत कहली, “ तहनी जईसन औरत के बल बूते प त ई चेशायर होम आ विरधा आश्रम बनल बा, आ आगे भी बनत रही. जदी तहरा जईसन औरत आपन घर में बढ़न बुडहन के तानिआसा परवाह करे आ उनकर संवेदना आ रख रखाव के तानियासा खेयाल राखो त अईसन संस्था के जरुरत ना पड़ी. पहिले त घर से उनका के खदेरी के बाहर हांक देलू लोग, आ बाहर अईसन संस्था में उनका के आपना किहे राखी के उनकर देखभाल कsके आपन अंहकार के तृप्ति भर लेत बाडू. आ फोटो अइसन फ्रेम में प्रशंसा पत्र लगा के अपने आपके शाबासी देत बाडू. आ आपन पीठ खुदे ठोकत बाड़ू. बईठ के चाटs आपन ई प्रंशसा पत्र . एकर धऊस हमारा के मत देखईह.” मोनी आपन समान उठवली आ चल दिहली आपन घरे. 
-------------------------------------
लेखक परिचय:- नाम: डाo उमेशजी ओझा
पत्रकारिता वर्ष १९९० से औरी झारखण्ड सरकार में कार्यरत
कईगो पत्रिकन में कहानी औरी लेख छपल बा
संपर्क:-
हो.न.-३९ डिमना बस्ती
डिमना रोड मानगो
पूर्वी सिंघ्भुम जमशेदपुर, झारखण्ड-८३१०१८
ई-मेल: kishenjiumesh@gmail.com
मोबाइल नं:- 943134743

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.