सुभाष पाण्डेय के पाँच गो कविता

चलऽ फुलेसर रङ्ग उड़ावऽ

चलऽ फुलेसर रङ्ग उड़ावऽ।

सुख-दुख लागल रही उमिर भर,
कुछ दिन त आनन्द मनावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

धरती पहिन पिअरकी साड़ी
फगुआ के कइली तइयारी
हरियर ताज गाछ का माथे
तीसी, मटर रङ्ग ले हाथे
छरकि-छरकि सबका पर डाले
तुहुँ चहकि के चहका गावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

काका, काकी खेले फगुआ
गारी गावे लगुआ-भगुआ
सभे रङ्गाइल, जानि परे ना
के बबुनी, के हउए बबुआ
देखऽ, भउजी झाँकत बाड़ी
पोति अबीर जोगीरा गावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

बुधना बाबू के चोटिआवे
हाड़ फोरि लगलें गरिआवे
केतनो भगलें भागि ना पवलें
पटकि के गोलुआ रङ्ग लगावे
भिजलें, मनलें, कहलें बाबू
ए मलिकाइन! पुआ खिआवऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

पिछिला बेर रिसिआइल रहलऽ
निमन-बाउर केतना कहलऽ
तब्बो भुवरा, दुअरा आइल
तजऽ लजाइल आ रिसिआइल
सभे मस्त बा, मस्त रहे दऽ,
दिल के तू दरिआव बनावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥
------------------------------------

राजनीति रउरा जिम्मे

हम तऽ बस खरची जुटिआईं, राजनीति रउरा जिम्मे।
जाति, धर्म, पाखंड, लड़ाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

मननीं रउरे बतलावेनीं, का खाईं, का पहिनीं हम?
तबहूँ ना तनिको घबड़ाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

भाँति-भाँति के आफर दे के भरमाईं, फुसिलावेनीं,
आफर के ठेंगा दिखलाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

टुकियो में ना साँच कहेनीं, झूठ उझिलनीं गाड़ी से,
बहुत भइल अब का पतिआई़? राजनीति रउरा जिम्मे।

कठिन भइल बा साँस लिहल अब, अइसन हवा बहा दिहनीं,
हम कतना ले फूल बिछाईं राजनीति रउरा जिम्मे।

संसद जा के मडरी बइठल, जनसेवा बैपार भइल,
जनता के कीमत लगवाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

सूखा, ओला, पानी, पत्थल फसिल उजरलसि, सुसुकीं हम,
रउरा चाभीं रोज मलाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

श्वेत वसन में मन बा करिया, बोली आगि लगावेले,
शहर-गाँव दिहनीं फुँकवाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

हे जनतंत्री महाराज! अब तनिका लहर सिकोरीं ना,
गूंग बना जनि गीत गवाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।
------------------------------------

नजरी डगरी ताकति बा

बदरी आवऽ हमरी नगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

सूखल पनघट, पोखर, कुइयाँ
असरा गिरल चिताने भुइयाँ
छलके नाहीं जल से गगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

बूढ़ लगे सब बिरिछ पात बिन
ठठरी सेवे दिनवाँ गिन-गिन
अइतू फिनु बन्हि जाइत पगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

धरती के कोरा अँचरा में
डालि खोंइछ बइठा पँजरा में
भरितू मांग पिन्हइतू मुनरी, नजरी डगरी ताकति बा।

छमछम छागल आजु बजावत
पुरुआ के संग नाचत गावत
आवऽ, तनि जा हरिअर चदरी, नजरी डगरी ताकति बा।
------------------------------------

चिरईया

खोजि ले ले दानापानी नन्हकी चिरईया, ऊ
केहू से ना माँगे कबो हाथ फइलाइ के।

चोरी, बरजोरी, सीनाजोरी, झकझोरी नाहीं,
खुद में मगन जँवजाल बिसराइ के।

अदगोई, बदगोई करे कुचुराई नाहीं,
माने ना रुआब केहू भूप के डेराइ के।

मनई के जाति हईं चिरई त होब नाहीं,
चिरई से सिखते उड़बि नभ धाइ के।
------------------------------------

का कहीं अपनी बेचैनी के

का कहीं अपनी बेचैनी के कहानी ए मिता!
जाल मकड़ी के बना अझुरा के छपटाइले हम।

एक ठाँवें एक छन ले ना बिलमनीं आजु ले,
बनि के मर्कट बिबिध डाढ़ी कूदि के धाइले हम।

गाँव का कुइयाँ का पानी से ना कइनीं आचमन,
दूर नदिया नित नहाए बेवजह जाइले हम।

सुनि के चरचा होत तनिको निज के आईं रोष में,
नून, मरिचा फेटि अनके बाति बतिआइले हम।

दिन उछन्नर, राति जागत धन व जस का फेर में,
चेट के मोती लुटा के धूरि गठिआइले हम।

रोशनी, बरखा, पवन, बरगद के शीतल छाँव में,
जाइ ना बिसराम कइनीं, झूठ छिछिआइले हम।

जिन्दगी के जिन्दगी दिहनीं ना कबहूँ हाथ में,
अब कहाँ, कइसे ले जाईं, सोचि पछिताइले हम।

रंग में अतना रंगइनीं खुद के पहिचानल कठिन,
के हईं हम का हईं सोचत में चकराइले हम।
------------------------------------

लेखक परिचय:-
नाम: सुभाष पाण्डेय
ग्राम-पोस्ट - मुसहरी
जिला - गोपालगंज बिहार



कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.