नूरैन अंसारी के सात गो कविता

केतनो रोई बाकिर

केतनो रोई बाकिर,अखिया लोरात नइखे!
दुःख दईबा रे ,जिनगी से ओरात नईखे!

कर देहलस बेभरम महंगाई आदमी के,
बोझ जिनगी के ढोवले ढोवात नइखे!

कबो बाढ़ आईल त कबो सुखाड़ ले गईल,
अब खेत कौनो, मन से बोवात नइखे!

खेतिहर मौसम के मार से टुअर-टॉपर भईल,
महल मड़ई पे तनको मोहात नइखे!

जहिया रहे जरूरत त तकबो न कईलेन,
आज बेमतलब के सटल सोहात नइखे!

"नूरैन" भीतर के मार लोग भीतर सहत बा,
सगरी बात पंच के आगे खोलात नइखे!
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धीरे-धीरे लोगवा बदल जाला एक दिन

धीरे-धीरे लोगवा.......... बदल जाला एक दिन
निर्मोही बनके करेजवा के छल जाला एक दिन।

अब कहाँ केहू याद करें बतिया पुरनका
भूल जाला लोग सगरी दिनवा निमनका।

जे लोग रहे आपन, आज उहे बिसारल
मन सबका से जीत के, अपने से हारल।

बरफ नियन नेकी, पिघल जाला एक दिन
धीरे-धीरे लोगवा.... बदल जाला एक दिन॥

जे साँच बा ओकरा के का केहू थाही
मुँहवा से बहुत लोग बन जाला दाहि।

खून के रिश्ता में नफ़ा-नुकसान न होला
केहू के जिनगी बनावल आसान न होला।

जे जईसन करेला फल जाला एक दिन
धिरे-धिरे लोगवा. बदल जाला एक दिन।

ना केहू आपन...ना केहू पराया बा
बड़ा बेकार भईया ई मोहमाया बा।

गरज पड़ला पर लोग तनिये में सटत बा
न त करईत साँप जईसन पीछे से डसत बा।

लोग रेंगनी के कांट नियन हल जाला एक दिन
धीरे-धीरे लोगवा..... .... बदल जाला एक दिन॥
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जिनगी के बोझ

केतनो रोई बाकिर,अखिया लोरात नइखे!
दुःख दईबा रे ,जिनगी से ओरात नईखे!

कर देहलस बेभरम महंगाई आदमी के,
बोझ जिनगी के ढोवले ढोवात नइखे!

कबो बाढ़ आईल त कबो सुखाड़ ले गईल,
अब खेत कौनो, मन से बोवात नइखे!

खेतिहर मौसम के मार से टुअर-टॉपर भईल,
महल मड़ई पे तनको मोहात नइखे!

जहिया रहे जरूरत त तकबो न कईलेन,
आज बेमतलब के सटल सोहात नइखे!

"नूरैन" भीतर के मार लोग भीतर सहत बा,
सगरी बात पंच के आगे खोलात नइखे!
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आ गईल बसंत

सर्दी, ठिठुरन, कँपकँपी के बीतते तुरंत
ओस, पाला, शीतलहरी, के होते ही अंत
झुमत, गावत, हंसत हँसावत आ गइल बसंत।

मोजर धइलस आम पर, गमके लागल फुलवारी
खेत सजल सरसों के, जईसे कौनो राजकुमारी।

झडे लागल पत्ता पुरनका, फूटे लागल नया कपोल
साँझ सबेरे सुने के मिले, कोयल के मीठे बोल।

जब बहे बयरिया पुरवईया, फसल खेत लहराय
देख के सफल मेहनत आपन,खेतिहर खूब अगराय।

जईसे साधना सफल भइला पर खुश होखस संत
झुमत, गावत, हंसत हँसावत आ गइल बसंत।

चूमे माथा धरती के उगते किरिनिया भोर में
चादर हरियाली के पसरल गँउआ के चारू ओर में।

रतिया भी लागे सुहावन, निमन लागे धुप भी
हल्की ठंडी, हल्की गर्मी से बदलल मौसम के रूप भी।

खटिया में गुटीयाइल बुढऊ, खड़ा भईलेंन तन के
ये रंग-गुलाल के मौसम में, चहके चिरई मन के।

पंख लगा के इच्छा सबकर, उड़े चलल अनंत
झुमत, गावत, हंसत हँसावत आ गइल बसंत।
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केतना बदल गइल बा गांव

घर घर संस्कृति शहर वाली लागल पसारे पाँव
एसी-कूलर के हवा में दब गइल बरगद के छाँव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव!

न रहल पुरनका लोग, न रहल बात पुरनका
किस्सा-कहानी बन गइल, सगरी चीज़ निमन का!

नवका फैशन में टूट गइल, सब लाज हया के डोर
भवे-भसुर, सास-ससुर के, रिश्ता भइल कमजोर!

मत पुछि त बढ़िया होइ, आज संस्कार के दशा
अब त लड़िका मारे बाप के, देखे लोग तमाशा!

केहु का कही के, मन से अब निकले लागल डर
गाव में बाबू जी से पहिले ही, बेटी खोज ले वर!

बदलल चाल-चलन के साथे, भेस भूषा पहनाव
इया,फुआ ,काका,काकी, बिसरल सगरी नाव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव!

सोहर, झूमर होरी के लोग, भूल गइल बा गीतिया
छूछे- छूछे बीत जाले छठ ,पीढ़िया,खर-जीवितिया!

बिरहा ,निर्गुन, चइता त सुने के खूब मन तरसे
बाकिर अपने में बेसास लोगवा निकले नहीं घर से!

प्रेम अउर भाईचारा में, हाकल डाइन लागल
दोसरा के देख के जरे के डाह मन में जागल!

पहिले जेकर बतिया मन, में मिसरी के रस घोले
अब पता ना उहे लोगवा, काहे तुरहा जइसन बोले!

पर्व त्योहार में भी नइखे,अब पहिले जइसन भाव
बिना मूँछ के लोगवा, मूँछ पर फेरत बाटे ताव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव!

कट गइल सगरी बाग-बगीचा, मुस्मात भइल फुलवारी
शहर में बसे के सबके, धइले बा घनघोर बीमारी
सुख गइल सगरी पोखरा-इनार, नहर भइल बियाबान
अपना दशा पर फफक- फफक के रोअत बा खलिहान!

गांव के लोगवा के ही आपन गांव ना निमन लागे
खीर-पूड़ी, के छोड़ के लोगवा पिज़्ज़ा के पीछे भागे!

मट्ठा-छाछ के जगे पिये लोग पेप्सी कोला ठंडा
क्रिकेट के आगे मुहधोआ, हो गइल बा गुलीडंडा!

पिछला एक दसक में भइया, गज़ब भइल बा बदलाव
डिजिटल दुनिया के पड़ल बा, बहुत गहरा प्रभाव
समय के संगे केतना, बदल गइल बा गांव!
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टुटही पलानी

जब-जब पढेनी हम बचपन के कहानी रे माई!!
बड़ा मन परे, आपन टुटही पलानी रे माई!!
चुए टिपिर-टिपिर बरखा में पानी रे माई!!
बड़ा मन परे ,आपन टुटही पलानी रे माई!!

जिनगी के केतना दिन बितल एकरा ओरा में
आन्ही-तूफान में,लुकाइसन जाके तोरा कोरा में
सगरी दुःख-दर्द के अभीनो बा निशानी रे माई!!
बड़ा मन परे आपन टुटही पलानी रे माई!!

रात भर नींद नाही आवे, धरकोसवा के हदासे
कबो खाईसन त, कबो सुत जाईसन उपासे
कबो भाग के सोयी सन अकेले, बथानी रे माई!!
बड़ा मन परे आपन टुटही पलानी रे माई!!

केतना हँसी -ख़ुशी रहे तब दुखो बेमारी में
आज चैन नइखे आवत बड़का कोठा-आमारी में
नईखे जात कबो घर से परेशानी रे माई!!
बड़ा मन परे आपन टुटही पलानी रे माई!!

देख लेहनी रही के मज़ा दिल्ली राजधानी में
मन करे लौट आई फिर टुटही पलानी में
सुनी सुत के तोहरा गोदिया में कहानी रे माई!!
बड़ा मन परे, आपन टुटही पलानी रे माई!!
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तनी रोवल भी जरूरी बा

हरदम हँसत अखियाँ के, तनी रोवल भी जरूरी बा !!
बंजर खेत पे कब्ज़ा खातिर, बोवल भी जरूरी बा !!

खाली आपन सोचेब त, एक दिन हो जाएम अकेला,
अपना संगे बोझ दोसरा के, ढोवल भी जरूरी बा !!

केकरा मन न करेला की , शीशमहल हम खरीदीं,
बाकिर इच्छा के संगे पाकिट आपन, टोवल भी जरूरी बा !!

खाली दोसरे के पय देखेम त, जिनगी पार ना लागी,
अपनों खेत के समय-समय पर सोहल भी जरूरी बा !!

ज़्यादा बड़का बनेम त, एक दिन चित से उतर जाएम,
सबकर प्रेम,स्नेह अपनापन से मन-मोहल भी जरूरी बा !!

"नूरैन" जे काल तक रहें आपन,उ काहे भईल बेगाना,
कबो टाइम मिले त एकरो कारन जोहल भी जरूरी बा !!
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लेखक परिचय:-
नाम: नूरैन अंसारी
नोएडा स्थित सॉफ्टवेयर कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर
मूल निवास :ग्राम: नवका सेमरा
पोस्ट: सेमरा बाजार
जिला : गोपालगंज (बिहार)
सम्पर्क नम्बर: 9911176564
ईमेल: noorain.ansari@gmail.com

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