चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही' के चार गो कविता

आदमी के आदमी हाय बा खा रहल

आदमी के आदमी हाय बा खा रहल
कइसन रात दिन बा जा रहल।

काँट से माली लगावत नेह बा
गम इहे जे फूल बा मुरझा रहल।

भूख के मारे अँधेरा छा रहल
आदमी जे चान से आगे बढ़ल।

स्वार्थ में सैतान के सरमा रहल
खा रहल बाटे जरह ई जान के।

मौत के पगचाप नगिचा आ रहल
मीड़ से कट के अकेला हो गइल।

चोट अपने आप बा सहला रहल
कइसन रात दिन बा जा रहल।
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बसन्त

आइल मस्त महीना सजनी, धरती पर मुस्कान रे।।
झुकल आम के डाढ़ि बौर से, भीतर कोइली बोलल
साँझ समीरन बहल मस्त हो, बिरहिनि के मन डोलल
महुआ के डाढ़ी पर उतरल, हारिल लेइ जमात रे।। आइल.....

लाल सुनर पतई पेड़न के फुलुंगी पर लहराइल
मारि-मारि ठोकर राहिन के नीलकंठ मँड़राइल
भइल पलास लाल दुहुटुहु रहल एक ना पात रे।। आइल.....

चढ़त गोराई बा गेहूँ पर, कतो बूँट कइलाइल
ऊगल चमचम चान गगन में, गोरिया देखि मुसुकाइल
एही अॅजोर में आवे के रहे पिया के बात रे।। आइल....
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आरोही पचीसा

अनजाना राही कहे, गलत के राह।
बुद्धिमान सम्मान के, करे कबो ना चाह ॥1॥

अनभल केहू के कइल, अपने पथ के कांट।
आरोही जीवन बदे, जीवन के सुख बांट ॥2॥

अनुशासन चादर तले, विहंसत घर परिवार।
अनुशासन के त्याग के ज्वालामय संसार ॥3॥

अंधकार में राह के भूले ना परकास।
कुच कुच करिया रात के, बादो भोर उजास ॥4॥

अपढ़ अनाड़ी लोग के, गांव नगर भरमार।
कहे लोग जनतंत्र के, जाहिल के सरकार ॥5॥

अपराधी आतंक से, दुनिया भले तबाह।
आरोही ना मिल सके, आतंकी से राह ॥6 ॥

अरुण अधर मुस्कत रहे, रोजे भोरम भोर।
आरोही के आँख में, संध्या लावे लोर ॥7॥

असुरक्षा के दायरा, होत तंग से तंग।
सासक सब महफूज बा, हत्यारन के संग ॥8॥

आँखिन पर पर्दा पड़ल दिल दिमाग बिकलांग।
अपने हाथे मारि के, काटे आपन टांग ॥9॥

आरोही आपन रहे, भइल पराया आज।
सूर, ताल, लय, छन्द, रस, बदल गइल सब साज ॥10॥

आरोही अविवेकता, प्रभुता अउरी अर्थ।
विद्यमान यौवन रहे, करे महान अनर्थ ॥11॥

आरोही गजबे मिल पानी के तासीर।
बढ़ते लीले गांव घर, घटे खेत दे चीर ॥12॥

आरोही जे झेल ले, हर आंधी तूफान।
समय साथ बांचल रहे, रचना बने महान ॥13॥

आरोही नाटक सही, सच्चा जीवन खेल।
समरसता पैदा करे, जाति धर्म के मेल ॥14॥

आरोही ममता मिले, धुआ काजल होत।
रहे आंख के किरकिरी, देत आँख के जोत ॥15॥

आरोही बर्बर बनल होखे बदे महान।
पूर्वज के आदर्श के समुझ गलत बेजान ॥16॥

आरोही सुविधा बदे, टूटे शासक लोग।
कलाकार ना टूट सके, लाखो विपदा भोग ॥17॥

ऊपर नीचे देख लीं, तबे उठाई पांव।
बिना पात के गांछ ना, आरोही दी छांव ॥18॥

कारन बने विनाश के, तबो रुप के दास।
धरा रक्त रंजित करे, साक्षी बा इतिहास ॥19॥

कांट कूश दलदल मिल, काहे होत उदास,
आरोही पतझड़ बिना आई ना मधुमास ॥20॥

काजल कमरा भीतरे, जाइब पाइब दाग।
सातो सागर साथ मिल गोरा करे ना काग ॥21॥

गांव सभा के ना मिल, आरोही अधिकार।
धरती पर ना आ सकी, जनतंत्री सरकार ॥22॥

घर पर धावा बोलके मार रहल बनिआर।
अन्हरा, बहिरा, गूंक बन, मौन रहत संसार ॥23॥

दवा, बीज, पानी करे, ठीक समय पर काम।
रती भर के बात ला, करीं सड़क मत जाम ॥24॥

पर उपकार भुलाई के, स्वारथ के बन दास।
धर्म ढोंग तीरथ, बरत, योग जाप उपवास ॥25॥
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आरोही हजारा के मोती

पनघट घुंघट सादगी, बर पीपर के छांव
कवन चुरा के ले गइल, काटे धावे गाँव।

काहे खातिर होत बा, लूट पाट उत्पात
जानत दुनिया गजनवी, रोवत सुसुकत जात।

गोरी सुतल सेज पर, कर सोरह सिंगार
सास ससुर कुत्ता बनल, नोकर बनल भतार।

देवर भाभी बीच में, छत्तीस के संबंध
सास पतोहिया बीच में रोज नया अनुबंध।

सुर ताल लय छन्द बिन, अब कविता बेकार
बिन साड़ी सिंगार के, लंगटे नाचत नार।

दिन दहाड़े रोड पर, आरोही कर लूट
लोकतंत्र में लोग के, सात खून के छूट।

अपढ़ अनाड़ी लोग के, गाँव नगर भरमार
कहे लोग जनतंत्र के, जाहिल के सरकार।

सोचल बोलल कइल जब, तीनो होखे एक
मानव बने महान तब, बने समाजो नेक।

भय केहू के देत ना, ना भय मानत आन
आरोही सब भ्रान्ति से, ग्यानी जन के जान।

आपनआपन पड़ल बा, का केहू से काम
अनकर बस्तीजारि के, के पाई आराम।

वादा के दे झुनझुना, पति आफिस में जात
आरोही सध्या समय, घुसतो घरे डेरात।

बोझिल कविता हो गइल, रसहीना बेकार
बिन पतई के गाछ पर, लागे फूल अंगार।

अर्थी पतई के उठा, सरपर चलल बयार
ढरढर डेला रो रहल, होके जार ब जार।

आरोही बरसात भा, गर्मी के दिन रात।
आवाँ भइल कुम्हार के, कटले कहाँ कटात।
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