राजनीति रउरा जिम्मे - सुभाष पाण्डेय

हम तऽ बस खरची जुटिआईं, राजनीति रउरा जिम्मे।
जाति, धर्म, पाखंड, लड़ाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

मननीं रउरे बतलावेनीं, का खाईं, का पहिनीं हम?
तबहूँ ना तनिको घबड़ाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

भाँति-भाँति के आफर दे के भरमाईं, फुसिलावेनीं,
आफर के ठेंगा दिखलाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

टुकियो में ना साँच कहेनीं, झूठ उझिलनीं गाड़ी से,
बहुत भइल अब का पतिआई़? राजनीति रउरा जिम्मे।

कठिन भइल बा साँस लिहल अब, अइसन हवा बहा दिहनीं,
हम कतना ले फूल बिछाईं राजनीति रउरा जिम्मे।

संसद जा के मडरी बइठल, जनसेवा बैपार भइल,
जनता के कीमत लगवाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।

सूखा, ओला, पानी, पत्थल फसिल उजरलसि, सुसुकीं हम,
रउरा चाभीं रोज मलाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

श्वेत वसन में मन बा करिया, बोली आगि लगावेले,
शहर-गाँव दिहनीं फुँकवाई, राजनीति रउरा जिम्मे।

हे जनतंत्री महाराज! अब तनिका लहर सिकोरीं ना,
गूंग बना जनि गीत गवाईं, राजनीति रउरा जिम्मे।
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लेखक परिचय:-
नाम: सुभाष पाण्डेय
ग्राम-पोस्ट - मुसहरी
जिला-- गोपालगंज बिहार

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