आवाज - दिनेश पाण्डेय

सबद आवाजें त ह।
आवाज लउके ना सिरिफ सुनल जाला।

अनगिनत किसिम के आवाज,
फरक बा त ओ से भइल कँपकँपी के जोर के,
बारंबारता के।
ई तय बात ह कि कहईं कुछ टकराइल होखी,
कुछ रगराइल, टूटल, काँपल आ चमकल होखी।
कुछ आग में जरल होखी,
कुछ पानी में सनल होखी।

सबद आवाजें त ह।
सुनऽ कि कतिना जोर बा ए में,
सुखद बा कि तकलीफदेह,
बेरि-बेरि बा कि फगुनी भोर में कोइलर के टाँसी,
कि फुट् दे भइल आ सब शांत।
देखऽ कि बनल का, बिगरल का?

बहुते आवाज बाड़ीसँ बर्हमंड में,
भितरा के, बहरी के।
ई त आदिमी के सामरथ
जे आवाज के बूझे लें,
डाँगर सिरिफ सुने लें, बूझस ना ठीक से।

भीतर के सुने से ज्ञानी।
बहरी के सुने आ बूझे सेहू ज्ञानी।
आ बहिरा?
ना सुने, ना बुझे।
ऊ अपने हद का हिसाब से
आउँ-आउँ कइले जाला,
आन के बुद्धि प तरस खात।

कुछ आवाज खाली चमगुदरिए सुनेलीसँ।
एही से सामने जवन अचल कालपरबत बा नू
ऊ खाली भूभुन टकराए से लाल भइल बा
आ नीचे के तलहटी में
कतिने ना चमगुदरिन के सुखवँता बन गइल बा।
दिकदारी ई बा
कि पूरा माहौल सड़ांध से भरि गइल बा।
महामारी फइले के साँका बा।
देखऽ,
आदिमी बाँची कि का?
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लेखक परिचयः
नाम: दिनेश पाण्डेय,
आवास संख्या - 100 /400,
रोड नं 2, राजवंशीनगर, पटना - 800023.
मो. न.: 7903923686

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