देशवा के देशवा क धुन कब होई - राम जियावन दास 'बावला'

दोबिधा में मनवा हमार होइ जाला
कले-कले दिनवाँ पहार होइ जाला।

ढेर परिवार क अपार लागै रोटिया
देहिया ढुकावै बदे, फटही लँगोटिया।
लोग बतावैला, सुधार होइ जाला।
कले-कले दिनवाँ पहार होइ जाला।

निरगुन बतिया, सगुन कब होई?
देशवा के, देशवा क धुन कब होई
दूर जइसे नदिया, किनार होइ जाला।
कले-कले दिनवाँ पहार होइ जाला।

बिजुरी जरत कारी रतिया न जाले
बेचलो इजतिया, बिपतिया न जाले
कइसे मानी, देशवा, उधार होइ जाला
कले-कले दिनवाँ पहार होइ जाला।

पनिया क भँवरा, थिराई कि दौं नाहीं
‘बावला’ कबहुँ सुख पाई कि दौं नाही
जस तिछुअरवा कटार होइ जाला।
दोबिधा में मनवा हमार होइ जाला
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लेखक परिचय:-
नाम: राम जियावन दास 'बावला'
जनम: 1 जून 1922, भीखमपुर, चकिया
चँदौली, उत्तर प्रदेश
मरन: 1 मई 2012
रचना: गीतलोक, भोजपुरी रामायण (अप्रकासित)

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