बदलत जा ता गउआँ-दुआर - प्रभाकर पांडेय

ऊँखियाड़ी में से एक बोझा गेड़ ले के लवटल रहनी तवले कहीं से रमेसरी काकी मिल गइली। हमके देखते कहतारी, 'ए बाबू तूँ तऽ फगुआ में कबो घरे ना आवेलऽ। ए बेरी कई बरीस की बाद आइल बाड़ऽ।'
'का करीं काकी, रोजी-रोटी के सवाल बा, ना तऽ केकरा घर छोड़ी के परदेस में रहे के मन करी?'
हमरी एतना कहते काकी कहतारी, 'अच्छा, ठीक बा, झँटीकट्टा में गेड़ धइले की बाद तनी हमरी दुआरे की ओर उपरइहऽ बाबू, कोल्हुआड़ चलता। पीए के कचरसो मिली अउर साथे-साथे गरमागरम महिया।”
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झँटीकट्टा में गेड़ धइले के बाद हम भँइसी के नादे पर से उकड़ा के खूँटा पर बाँधि देहनी। ओकरी बाद ओकर ओढ़नी-सोढ़नी ठीक कइले की बाद रमेसरी काकी की दुआरे की ओर चल देहनीं। रमेसरी काकी की दुआरे पर पहुँची के का देखतानी की पिंटुआ गुलवरी झोंकता अउर फगुआ टेरले बा। अपनी आप में ऊ एतना मस्त बा की हमार उहाँ पहुँचल ओकरा बुझइबे ना कइल। हमहीं टोकनी, 'अउर हो, पिंटु लाल! का होत जाता? खूब नऽ फगुआ टेरतारऽ।'
ए पर पिंटुआ कहता, 'भइया तोह लोगन की आसिरबाद से सब बढ़िया चलता। अच्छा कइलऽ ह कि ए बेरी फगुआ में घरे चलि अइलS हऽ। कचरस पियऽ, तवकेल कुछ समय में महियो तइयार हो जाई।'
हम कहनीं, 'हँ बाबू, बहुत दिन हो गइल महिया खइले। कचरस तऽ सहरियो में मिल जाला पर गरमागरम महिया खातिर जीव तरसेला।'
महिया-ओहिया खइले की बाद घरे पहुँचनी। घरवों माई दसगो ऊँखी तुड़वा के मँगवले रहे अउर ओ के पेरवा के रसिआव बनववले रहे। ना-ना कहत भर में एगो बड़हन कटोरा में एक कटोरा रसिआव खिलाइए देहलसी।
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साझीं खान समति खातिर पतई बिटोरे गइनीं जाँ। लइकन के लंठई चरम असमान पर रहे। देखते-देखते खमेसर बाबा की गोहरउरी में टूट पड़ने सन। हम घोंघिअइनी की अरे पूरा गोहरउरिया टूड़ि के मति उठा लऽ लो कुल। दु-चारगो गोहरा उठावऽ कुल। पर हमरी बाती पर के धेयान देता। उनकर पूरा गोहरउरी तहस-नहस हो गइल। गोहरा उठा के सब लइका भागत-परात गढ़ही किनारे अइने सन अउर उ पूरा गोहरा समति में डडले की बाद एक बेर फेनु हुमच्चा बाँधि के खमेसर बाबा की खरिहाने में पहुँची गइने सन। ना केहू के रोक रहे अउर ना टोक। अउर केहू, केहू के सुनलहूँ के तइयार ना रहे। खमेसर बाबा की खरिहाने में पलानी छावे खातिर पतहर गाँजल रहे अउर बगलिए में नेवँछि के पतई धइल रहे। अबहिन केहू कुछ कहो तवलेकहिं सब लूट पड़ने सन अउर केतने बोझा पतहर अउर पतई उठा के गढ़ही की ओर भगने सन।

अबहिन समति में उ पतहर, पतई गँजात रहे तबलहीं खमेसर बाबा लउर उठवले गरियावत समति की लगे पहुँचने। सब लइका भागि-परा गइनेसन। खमेसर बाबा हांड फोंड़ि के गरिआवत रहने। ओ बेरा अगर कवनो लइका धरा गइल रहित त उ जरूर ओकर कपार फोड़ि देले रहतें। खमेसर बाबा की पीछे-पीछे उनकर दुनु लइका लोग भी पहुँचल। उ लोग समति पर से पतहर, पतई उठा के फेरु लिया के खरिहाने में गाँजि देहल।
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एन्ने लइका कहाँ मान में आवे वाला रहने सन। जब भिनसहरा भइल, उ कुल गोल बना के खमेसर बाबा की खरिहाने की लगे जमा हो गइनें सन। सब केहू चुपचाप रहे। खमेसर बाबा अउर उनकर दुनु लइका लउर लेहले खरिहनवे में पतहर, पतई की लगहीं सुतल रहे लोग। पर रातिभर मेहनत कइले की कारन अब ओ लोगन के खूब ओंखी लागि गइल रहे। एगो लुकारा में आगि लगा के ओ पतहर में फेंका गइल। लुकारा फेंकते फेरू से लइका भागि-परा गइनेंसन। खरिहाने में पहतर-पतई से लहासि उठे लागल। एइसन लागल की ओ लहासि में खमेसर बाबा अउर उनकर दुनु जाने लइको सोवाहा हो जाई। इ लहासि देखि के भागल-पराइल सब लइकन के साँप सूँघी गइल। केहू लगे तऽ ना आइल पर दूरहीं से अपनी करनी पर जरूर पछतात रहे।अच्छा भइल की तवलेकहीं लालजी बाबा जागि गइल रहनें अउर डोल-डाल होके लवटल रहनें। लहासि देखि के उ चिल्लात दउड़ने अउर खमेसर बाबा अउर उनकरी दुनु लइकन के जगवने। अगर उ दू-चार मिनट अउर देरी से पहुँचल रहतें त सब कुछ तबाह हो गइल रहित अउर सायद हमरी गाँव से हमेसा-हमेसा खातिर फगुआ के तेवहारो। लालजी बाबा कुछ लोग के नाव धऽ के हाँक लगवने। लोग बाल्टी में पानी ले-ले आके आगि बुतावे लागल। आगि बुतावल सुरु होते सब लइका लंक लगा के अपनी-अपनी घरे भागि गइनें कुल। खमेसर बाबा अउर उनकर दुनु लइका बिना कुछ बोलले आपन बिछवना अउर लाठी उठावल लोग अउर अपनी घर की ओर चल देहल लोग। अइसन लागत रहे की ओ लोगन के अब ए पतहर अउर पतई से पूरा तरे मोहभंग हो गइल बा।
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आगि बुतवले की बाद कुछ गँवई बुढ़-पुरनिया के गुस्सा लइकन पर निकले त कुछ खमेसरे बाबा के दोस दे लोग। कुछ लोग के कहनाम रहे की खमेसर बाबा के समति में से पतई उठावल ना चाहत रहल हऽ अउर अगर उठइबे कइनें हँ त सब लोग के ओही बेरा बोला के कहले रहतें त ओ ही बेरा लइकन के डँटाई हो गइल रहित। खैर पर गाँव के बुढ़वा गोल लइकन पर एकदम से रिसिआ गइल। एक जाने पुरनिया कहनें की अब जुग-जबाना बदलता। त जबाना की हिसाब से काम करे के चाहीं। अगर ए पतई बिटोरले के ले के कपड़ फोड़उअल हो गइल रहित त गाँव-जवार में अपनी गाँव के केतना हँसाई होइत।

ओही बेरा बाबा हमके हाँक लगवने अउर हमरी पहुँचते कहने, 'ए बाबू, ए सब की पीछे तूँही बाड़ऽ। तीन-चार साल गाँव में फगुआ बड़ी निमन से निबहि गइल हऽ, पर ए साल तोहरी अवते हंगामा सुरु हो गइल बा। ए बाबू बकसि दऽ।'
हम कुछ बोलनीं ना। चुप्पे रहि गइनीं पर एगो बाति हमरी दिमाग में चलत रहे कि का ए सब के जिम्मेदार हमहीं बानी? खैर छोड़ी उ सब, फगुआ आ गइल बा, फगुआ मनाइबीं पर केहू के दिल दुखा के ना, सबके हँसा के।
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बदलत जा ता गउआँ-दुआर - प्रभाकर पांडेयलेखक परिचय:-
नाम: प्रभाकर पांडेय
जन्मतिथि- 01.01.1976
जन्मस्थान- गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश)
पिता- स्व. श्री सुरेंद्र पाण्डेय
शिक्षा- एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान)

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