मन भीजि जाला - सत्यनारायण मिश्र ‘सत्तन'

मड़इया में मोर मन भीजि जाला।
सुखवा क ताना अ दुखवा क बाना
हेरि-हेरि हारीं हेराइल बहाना
संझा बिहान ओरहन भीजि जाला।

हियरा जो तड़पे त बदरा रसाए
बदरा रसाए त कजरा धोवाए
कतनो बचाईं दरपन भीजि जाला।

बुन्न-बुन्न सिरजीं भरै नाहिं गगरी
पयराइल पउरख पिरिथवी सगरी
पल-पल पिराला परन भीजि जाला।

नान्ह-नान्ह सपनां संवारैले नेहियां
निरखि निरासा उघारै ले देहियां
नहकै निबहुरा नयन भीजि जाला।
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सत्यनारायण मिश्र ‘सत्तन'

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