संपादकीय

कलयुग कऽ रंग - निशा राय

चाहे घर होखे चाहे गाँव होखे,
चिहे जिला देश विदेश होखे,
हर जघे एके बाजा बजावत बा,
कलयुग आपन रंग देखावत बा।

धन खातिर पूत कसाई भईल,
सास बहू के गला दबावत बा,
धन खातिर बा भाई-भाई बैरी
जान लेवे खातिर दउरावत बा।
कलयुग आपन रंग देखावत बा।

इ हिन्दू हवे,इ ह मुसलिम,
इ सिक्ख,इसाई,यहूदी हवे,
धर्म के नाम पर उत्पात मचल,
आदमी आदमी के मुआवत बा।
कलयुग आपन रंग देखावत बा।

गढ़ले प्रभु जी सबके एके खाँ
एके हाड़ मास लगावत है
सब जीव एके प्रभु के पुत्र हैं
काहें आदमी भेद लगावत बा।
कलयुग आपन रंग देखावत बा।

एक दिन इ जंग हो जाइ खतम,
सबका मन से मिट जाई भरम,
सब पंछी लेखा जहाँ चाही रही
औउरी प्रेम के शीतल बयार बही
इ सोच के मन बहलावत बा।
कलयुग आपन रंग देखावत बा।
कलयुग आपन रंग देखावत बा।।
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लेखक परिचय:-
नाम: श्रीमती निशा राय
पता: रामअवध नगर
पो.-जंगल चौरी,खोराबार
जि.- गोरखपुर,पिन-273010
उत्तरप्रदेश
मो न.: 8542898686
mail-rainisha29.nr@gmail.com

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