संपादकीय

चइतवा बड़ निक लागे - डॉ अशोक द्विवेदी

अँतरा लुकाइल अन्हरिया
चइतवा बड़ निक लागे।
टह टह , टहके अँजोरिया
चइतवा बड़ निक लागे।

झपसल डाढ़ि, हँसल अमरइया
झाँवर मुख पर चढ़ल गोरइया
झूमल घन बँसवरिया
चइतवा बड़ निक लागे।

धइले मोजरिया के,नन्हका टिकोरवा
जस, दुधकटुवा छोड़े न कोर वा
कतनो चढ़े दुपहरिया
चइतवा बड़ निक लागे।

मन मधुवाइल, तन अलसाइल
नव सिरजन के, रंग रँगाइल
नीक ना लागे कोठरिया
चइतवा बड़ निक लागे।

टह टह टहके अँजोरिया
चइतवा बड़ निक लागे॥
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लेखक परिचय:-

नाम: डॉ अशोक द्विवेदी
संपादक: पाती
रचना: बनचरी, फुटल किरिन हजार, गाँव के भीतर गाँव आदि
सम्मान: राहुल सांस्कृत्यान पुरस्कार, भोजपुरी शिरोमणि आदि
बलिया, उत्तर प्रदेश

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