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कंकाल के रहस्य - 12 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

यस.पी. साहब के मदद से पाड़ेजी सोहन के मोबाईल फोन काँल के दिटेल लेबे खातिर व्यवस्था कर देबेले आ अगला दिना उनका घर पर सब डिटेल पहुँच जाला. डिटेल पढ़ला के बाद पाड़ेजी एक जगह पर फोन मिला के एक दुसर नम्बर के काँल डिटेल आ ओकरा के मानिटरिंग पर डाले के निर्देश दे देले, अब आगे..

बनारस के भीड़ भाड़ वाला बाजार में एगो पी. सी. ओ. पर एगो मजदूर से देखाई देबे वाला मनही बाजार के तरफ पीठ करके केहु के फोन करत रहे.
'बाबू साहब नमस्कार...' दुसरा तरफ से हेलो के आवाज अईला पर पी. सी. ओ. वाला आदमी कहलस.
'नमस्कार. के बोल रहा है.?
'के बोलत हव जान के का कर बा बाबू साहब बस समझ ला कि हम सोहन संगी., चाहे त हम कमली के अदमी भी कह सकत हउआ...'
'कवन सोहन? कवन बिजली?' दुसरे तरफ के आवाज में तनी घबराहट महसूस होत रहे.
'कमली के ना जानत हउआ समझ सकि ला लेकिन सोहन के ना जानत हउआ तब कवनो बात नाही हम सब कुछ गमछा पाड़े के बता देब सब कुछ खुदे सामने आ जाई...' कहत के पी. सी. ओ. वाला फोन रख देहलस बाकि उहाँ से हटल ना आ वइसहीं खाड़ रहल. अगला मिनट में ही फोन बाजल आ पी. सी. ओ. वाला के जगहा उहे फोन उठवलस जईसे ओकरा मालूम रहे कि ओकरे फोन होखी आ ऊ पहिले से ही पी. सी. ओ. वाला के एकरा खातिर बता देले हो.
'तऽ एकर मतलब ई भयल कि आप सोहन के जानत हउआ?'
'हाँ.. लेकिन कमली?' दुसरा तरफ से आवाज आईल मानो ऊ कमली के बारे में सच में ना जानत हो.
'कमली वही हव बाबू साहब जवन आप के बदे बिजली रहल अउर जेके आप अधिकारियन वाले कालोनी के पिछवाड़े खतम कर देहला वईसहीं जईसे कि सोहन के सिनेमा हाल में...'
'सब झूठ.. का सबूत हौ.?'
'सबूत कऽ बात तऽ अदालत करी बाबू साहब..हम तऽ खाली गमछा पाड़े के ई बता सकी ला कि कईसे आप ठंडा वाली दुकान से ठंडा खरीद के ओम्मे कुछ पाउडर मिलवला फिर सिनेमा खतम भईले पर पुलिस के सोहन कऽ लाश मिलल...'
'.........????' दुसरे तरफ से कवनो आवाज नाही.
'आप शायद ई सोचत हो बऽ कि हमके एतना सब कुछ कईसे मालूम अउर हम एतना दिन खामोश काहे रहली.. त सुना कमली के मौत क खबर मिलले के बाद से ही हम सोहन के पीछे पड़ल हई..फिर सिनेमा हाल के बाद से आप के पीछे...चाहीत त आपके घरे भी आ सकत रहली लेकिन ओम्मे हमरे जान कऽ भी खतरा रहल... यही से आप कऽ नम्बर जाने के पीछे पड़ गईली अउर जब नम्बर मिल गयल तब सोचली कि गमछा पाड़े के पास जाये से पहिले एक बार आपसे बतिया ली काहे से जेके जाये के रहल चक गयल.. आप कहीं भी रहा हमके का फरक पड़ी.. लेकिन यदि हमके कुछ मिल गयल तऽ हमार जिनगी जरुर बन जाई..अआप समझत हउआ नऽ हमरे कहे क मतलब?' पी. सी. ओ. वाला आपन बात कह के दुसरे तरफ के जवाब खातिर इंतजार करे लागल.
'हम पचास हजार दे सकत हई..' दुसरा तरफ से आवाज आईल तऽ पी. सी. ओ. वाला व्यंग से बोललस..
'बाबू साहब कमली जिन्दा होत तऽ अब तक न जाने केतना ५०००० कमा लेले होत...दू खून के कीमत ५००००..? कुछ कम नाही हव.?'
'हम एक लाख से एक पईसा बेसी नाही देब...' दुसरे तरफ से आवाज आईल...
'बाबू साहब जानत हई कि पहुँचल भयल आदमी हउआ ऊ दुनो के तरह हमहुँ के खतम कर सकत हउआ चाहे करा सकत हउआ.. लेकिन १० लाख से नीचे में बात ना बनी... बात समझ में आये तऽ संझा तक अपने घरे के छत पर लाल कपड़ा लगा दिहा नाहि त हमके कवनो दोष मत दिहा....'
'लेकिन.?'
'लेकिन वेकिन नाही पूरा १० लाख अउर हाँ शहर से भागे के कोशिश बेकार रही काहे से कि हमार नजर सिर्फ अउर सिर्फ आप पर ही हव अउर हम सिर्फ संझा तक इंतजार करब...'
कह के पी. सी. ओ. वाला फोन रख के दुकान वाले के पइसा देके सामने बाजार के तरफ मुड़ल त साफ पहिचान में आ गईल कि ई अउर केहु ना बल्कि ठलुआ हव. एहर ओहर देखे के बाद ठलुआ एक तरफ चल पड़ल आ एक मोड़ पर मोटरसायकिल के साथे खड़ा पाड़ेजी के तरफ देख के काम हो गईला के इशारा कईलस आ फिर उनका पीछे जाके बईठ गईल आ पाड़ेजी आपन मोटरसायकिल आगे बढ़ा लिहले...
एह घटना के तनिका देर बाद ठलुआ अउरी पाड़ेजी यस. पी. साहब के सामने बइठल रहे. यस. पी. साहब के चेहरा से लागत रहे कि ऊ काफी गहरा चिन्ता में पड़ल बाड़े...
'गमछा महाराज आपके बहुत बहुत धन्यवाद.. जेतना सबूत आप जुटा देले बायन ओतना कातिल के पकड़े खातिर काफी हव लेकिन...' यस. पी. साहब के स्वर में चिन्ता साफ महसूस होत रहे..
'लेकिन का यस. पी. साहब?'
हम चाहब कि कातिल के गिरफ्तारी में ही आप ही सामने रहा.. हम समझत हई कि आपके हमार मजबूरी समझ में आ रहल होई? यस. पी. साहब कहले.
'ओहमा कवनो समस्या नईखे बस तनिका ठलुआ के ऊपर खतरा बनल रही...'
ओकरे खातिर आ‍प निश्चिन्त रहल जाये.. ठलुआ पर खतरा के पहिले सामने वाला ई दुनिया में ना रही बस आप ओके कवनो खाली जगह में बोलावे कऽ इंतजाम करके हमके सूचना दे देब बकिया हम देख लेब.. वइसे थोड़ा देर बाद से हमार बहुत भरोसे कऽ जवान कातिल पर नजर रखे शुरु कर दी...'
' फिर तऽ कवनो बाते नईखे.. हम आपके पूरा सूचना दे देब...' कहत के पाड़ेजी खड़ा हो गईले साथे साथे ठलुओ खड़ा हो गईल..
के रहे कातिल.?, कातिल में अइसन का बात रहे कि यस. पी. साहब सोच में पड़ गईले?, का सचमुच कंकाल के रहस्य पर से परदा उठला के बाद कातिल पर से भी परदा उठ जाई..? जाने खातिर इंतजार करीं अगिला भाग के...
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"


 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 98 (20 सितम्बर 2016)

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