संपादकीय

अमृत-ध्वनि छंद - पं धरीक्षण मिश्र

ठनगन समधी नाधि के, बकें अण्ट के पण्ट।
बेटिहा भेजले अन्त में, लट्ठद्धर कुछ लण्ठ॥
लट्ठद्धर कुछ लण्ठज्जबर, गरज्जद्धरधर।
धद्धग्गरदन चच्चच्चटकन थत्थत्थप्पर॥
गातल्लडरि पिटातस्सब सुधियातत्तनमन।
खातक्कवर सुहातट्ठहर भुलातट्ठनगन॥१॥

गरजत समधी के अनुज, जे बड़ तेज तरार।
रहि रहि उन पर क्रोध के, ज्वारर्रहत सवार।
ज्वारर्रहत सवारज्जरत कपारच्छनछन।
नातन्निज बरियातस्सब अनुसातज्जनजन॥
जोगघ्घटत कुजोगल्लखि सब लोगब्बरजत।
मानेंत्तनिक न जानेंस्सुपद निछानेग्गरजत॥२॥
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पं धरीक्षण मिश्र



 







अंक - 98 (20 सितम्बर 2016)

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