संपादकीय

बाबूजी कि फादर - रश्मि प्रियदर्शनी

नरेस - "हेल्लो...हां पापाजी...परनाम..कइसन बानी?"
पापाजी - "खुस रहs बेटा... सब ठीक बा...तू ठीक बाड़s नू? कइसन गइल अबकी परिक्छा ??"
नरेस (बात काट के) - "अरे पापाजी..हैप्पी फादर्स डे"
पापाजी - "आssयं !!"
नरेस - "कहs तानी, हैप्पी फादर्स डे"
पापाजी - "अच्छा अच्छा"
तब तक पापाजी के इयाद आ गइल की नया साल पर नरेस "हैप्पी न्यू इयर "कहला पर "सेम टू यू "कहे के सिखवलs रहलन..
पापाजी (जल्दी से) - "हाँ बेटा... सेम टू यू"
ओने से हँसी के तेज़ आवाज़ आईल.. पापाजी अचकचा गइनी... नरेस के हँसी के अलावा दू तीन गो जनाना हँसी के आवाज़ भी सुनाइल।
नरेस - "का कहनी हईं पापाजी..तनी फेरु कहेम !!"
पापाजी- " कुछु गलती कह देनी हईं का बेटा?"
नरेस (हँसी रोकत) - "अरे ना ना पापाजी, एकदम सही कहनी।"
ई कह के नरेस मने-मन आपना के होखे वाला फादर, आ बगल में बइठल आपन महिला मित्र के होखे वाली मदर के रूप में सोच के मुस्कियाये लगलन। तब तक पिताजी के फेरु नरेस के परिक्छा याद आ गईल - "बेटा.... बतइलs ना..परिक्छवा कइसन गइल..अबकी निकल जाई नू?"
नरेस पिताजी के सवाल पर मोबाइल के स्पीकर बंद कइलन..आ फ़ोन कान से सटा के कहलन -" साझी के फेरु बतीयाएम पिताजी"
नरेस फ़ोन काट के आपन हमजोली लोग के साथे 'हँसी-मजाक' में फेरु सामिल हो गईलन..आपना पिताजी के 'मजाक' बना के..।
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लेखक परिचय:-

नाम: रश्मि प्रियदर्शनी
सदस्य - मैथिली भोजपुरी अकादमी,दिल्ली
पत्रकारिता/स्वतंत्र लेखन
सांस्कृतिक कूटनीति कऽ संस्था 'फ़ोरम फॉर कल्चरल डिप्लोमेसी' कऽ संचालन
अंक - 89 (19 जुलाई 2016)

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