संपादकीय

गमछा पाड़े - 8 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

महादेव बाबू के घर के दालान में राजन अउरी ममता साथे बइठ के अपना बियाह के बात करत रहे कि इन्सपेक्टर सिंह के आवाज से दुनो लोग चौंक जा ता.
'हम अन्दर आ सकत हईं?'
'अरे इन्पेक्टर साहब आप अचानक.. ?' ममता उनकरा के अन्दर आवे के संकेत करेले, इन्सपेक्टर के साथे दुगो सिपाही, मोहन अउरी बुआजी भी रही जिनका के देख के ममता अउरी राजन के अउर भी आश्चर्य हो ला.
'ममता जी माफ करा. हालात केतनो खराब हो, हमरे अधिकारियन के नजर में ई दुनो लोग कातिल ना हो सकत हव. एहि से हम ई लोग के ईहाँ लेके आइल हई.'
'अईसन कईसे हो सकत हव? अबही ४ घंटा पहिलहीं त दुनो जने आपन जुर्म कबूल कईले रहन.' इन्सपेक्टर के बात सुन के ममता अउर राजन दुनो के आश्चर्य के सीमा ना रहे आ राजन के ई सवाल से लागत रहे कि सबसे ज्यादा ओकरे के कष्ट भइल होखे.
'राजन बाबू जुर्म कबूलला से ज्यादा जरुरी होला सबूत. अउर पुलिस के पास ई दुनो लोग के खिलाफ कउनो सबूत नाही हव. साथही कतल के जगह के हालात अउर ई लोग के कबूलनामा से भी अईसन नाही लगत हव कि ई लोग कतल कईले होई. हम लोग के काम रहल ई दुनो जने के सही सलामत आप लोग के हवाले करे क. बाकि एक बात के आप लोग के खास ध्यान धरे के होई.' इन्सपेक्टर सिंह राजन के बात के जवाब देके कुछ कहे चहले त ममता सवाल कईलस...
'कवन बात इन्पेक्टर साहब?'
'ई लोग ईहाँ से कहीं जा ना पावे. अउर यदि गइल भी त पुलिस के तुरन्त सूचना मिले के चाही.' एतना कहला के बाद इन्सपेक्टर, राजन अउर ममता के आश्चर्य के डाल के अपना दल बल के साथ वापस चल गइले. जेकरा बाद दालान में तनिका देर खातिर खामोशी छा गइल. के का बोले, केहु के कुछ समझ में ना आइल. राजन अउर ममता के चेहरा पर जहाँ बुआ आ राजन खातिर नफरत झलकत रहे ऊँहे बुआ अउरी मोहन के चेहरा पर ग्लानि के भाव स्पष्ट रहे.
'ममता बिटिया.' बुआजी कुछ कहे चहली त ममता हाथ क इशारा से उनके चुप रहे के कहलस अउरी राजन के साथे अन्दर जाये लागल कि दरवाजा से पाड़ेजी के आवाज आईल..
'अइसनो का हो गइल ममता बिटिया, कि बहिना के बातो सुने से इंकार कर रहल बाड़ू?'
पाड़ेजी के आवाज पर सबकर ध्यान दरवाजा पर गइल त पाड़ेजी ठलुआ क साथे अन्दर आवत रहले.
'गमछा चच्चा! आप पुलिस के हरकत देखत हउआ न?' ममता के चेहरा पर अबहियो पूरा घटना के लेके रोष साफ झलकत रहे.
'काहे ना बिटिया. बाकि ई त हमहू जानिले कि ई लोग कातिल नाही बा.' पाड़ेजी ममता के बात सुन के इत्मिनान से कहले त सब आश्चर्य में पड़ गइल. ईहाँ तक कि मोहन अऊर मोहन के माई भी.
'ई का कहत हउआ गमछा चच्चा.' पाड़ेजी के जवाब पर ममता सवाल कईलस.
'हम बिल्कुल सही कहत बानी बिटिया रानी. कातिल ना त मोहन बबुआ बाड़े अउरी ना ही बहिना बाड़ी. कातिल त केहू अउरे बा.' पाड़ेजी जेतना आराम से जवाब दिहले ओतना आराम से केहु एह जवाब के पचा ना पावल. मोहन का माई से ना रह गइल त ऊ आपन भड़ास निकाले खातिर पाड़ेजी से सवाल कईली...
'जब हम लोग कातिल नाही हई त हम लोग क साथ एतना बड़ा मजाक काहे कइलऽ गमछा?'
'माफ करीहऽ बहिना. महादेव बाबू के असली कातिल तक पहुँचे खातिर ई सब जरुरी रहे. आ हमरा यकीन बा कि जब कातिल पकड़ल जाई त सब केहू हमरा के माफ कर देही.'
'मतलब ई कि अब आप असली कातिल तक पहुँच गइल हउआ?
' पाड़ेजी के बात सुन के राजन सवाल कइलस त पाड़ेजी फेर कहले...
' अबही ना जवाँई बाबू. काहे से कि हमार दुसरको शक बेकार हो गइल बा.'
पाड़ेजी के एतना बात सुन के राजन के मुँह बन गइल आ पाड़ेजी के अब तक के करनी का आधार पर ऊ उनकरा पर कमेन्ट कर बईठल...
'चच्चा, हमके तऽ अब लगे लगल हव कि आप सिर्फ ख्याली पोलावे पकावत हउआ. हम लोग के बाबूजी के कातिल के पकड़वावे के जरुर हव बाकि ई सब नौटंकी देखले बिना. हम त अब ईहे कहब कि अब आप ई सब नाटक बन्द कर दऽ.'
'राजन.' एकरा पहिले कि राजन के बात सुन के पाड़ेजी कुछ कहतन, ममता राजन के टोक दिहलस. ओकरा चेहरा से लागत रहुए कि चाहे कुछ हो राजन के बात ओकरा अच्छा नइखे लागल.
'कउनो बात नाही ममता बिटिया. जवाँई बाबू के बात के हमके जरिको बुरा ना लागल. बाकि अब जब एतना सब कुछ हो ही गइल त हम जवाँई बाबू से कहेब कि हमार एगो आखिरीओ कहानी सुनिये लें. शायद हमरा कहानी से खुश हो के जवाँई बाबू के हमरा बारे में बिचार बदल जाव.', एतना कहला क बाद पाड़ेजी सबकरा के बारी बारी से देखे के बाद राजन के तरफ देख के कुछ कहे के ईजाजत मँगले आ राजन के कुछ कहे से पहिले ही आपन कहनी शुरु कर दिहले....' ममता बिटिया हमके माफ कर दीहऽ. कातिल क रुप में हमरा तोहरा पर पूरा शक रहे बाकि जब ध्यान से खोज कइली त हमार शक मिट गईल. बाकि हमके असली कातिल तक पहुँचे के रास्तो मिल गईल. कातिल के बा ई बात सबकरा के मालूमे पड़ जाई जब कातिल पुलिस के सामने आपन जुर्म कबूल करी.. बाकि कतल कइसे भइल हम ओकर पूरा ब्योरा बता रहल बानी. अपना मौत से एक दिन पहिले महादेव बाबू क केहू से झगड़ा भइल रहे आ जेकरा से झगड़ा भइल रहे ऊ ई बात अच्छा तरह से जानत रहुवे कि यदि महादेव बाबू जिन्दा रहिहन त ओकर बहुत बड़ नुकसान हो जाई. ओकरा के इहो बात निमना से मालूम रहे कि महादेव बाबू शाम होखते अपना कमरा में शराब पियेले. ओकरा ईहो मालूम रहे कि मोहन के ऊपर केहु के लाख रुपया बकाया बा. आ ओही के दवाब में आके ओह दिना मोहन के लेनदार मोहन पर रुपया देबे के जोर दिहलस ताकि मोहन अउरी महादेव बाबू मे झगड़ा हो अउर ऊ आपन काम कर जाव.'
एतना कहला के बाद पाड़ेजी सबकरा के बारी बारी से देखे लगले त पवले कि सब उनही के आगे के कहानी जाने खातिर बेचैनी से देख रहल बा.
पढ़ीं अगिला अंक में..............
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 84 (14 जून 2016)

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