संपादकीय

तू धीरे आव - अरुण शीतांश

रानी गावत बाड़ी गीत
उनकर लागल बा प्रीत
हम कोलकत्ता बानी
जंगल झाड़ खोजत फिरत 
गावत 
पकावत
लेके दूगो रुमाल
फेफेरी भईल बा बेहाल 
तू 
धीरे आव।

अंक - 23 (14 अप्रैल 2015)

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