संपादकीय

अब्बो ले सुपवा बोलेला - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

ताल तलहटी, गाँव के रहटी 
कब फूटल किस्मत खोलेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।

दिन में खैनी साँझ के हुक्का 
भोरहीं आइल साह के रुक्का 
खेती में ना भयल कुछहु 
अन्दाता फुक्के का फुक्का 
बिगरल माथा डोलेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।

बाढ़ बहवलस गाँवे गाँव 
पहरी पर अब बनल ठांव 
मदत लीहने शहरी बाबू 
अब कइसे मोर पड़ी पाँव 
फंसरी में , मुड़ी तोलेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।

नन्हकी आपन भइल सयान 
कब ले राखब ओकर ध्यान 
धावत धुपत घिसल पनही 
बेटहा के बा ढेर पयान 
हिम्मत के थुन्ही डोलेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।

बंसखट भइल दुअरे सपना 
बइठे वाला ना केहू अपना 
नेह छोह के किस्मत फूटल 
उधार पइंच भइल कलपना 
मन, भर गगरी विष घोलेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।

हम बानी लइकी के बाप 
सोचत छाती लोटत सांप 
कइसे लागी हाँथे हरदी 
सोचत बेरी गइली काँप 
बिन बेटी घर ना सोहेला।
अब्बो ले सुपवा बोलेला।
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अंक - 79 (10 मई 2016)

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