संपादकीय

छुंछा के बा, के पुछवइया - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

तातल गरमी ओहमे उबलत 
ध के मुठिया खेत में डोलत 
ओठ झुराइल भइल दिनौनी 
चमड़ी जोहत बा पुरवइया। 
छुंछा के बा, के पुछवइया।

आइल बचपन, गइल जवानी 
बीतल जिनगी चढ़ल न पानी 
छोटकन के तन कसहूँ ढकली 
बोलत बोलत बप्पा मइया।
छुंछा के बा, के पुछवइया। 

कब्बों जे कुछ भयल खेत में 
नाही मयस्सर उहो पेट में 
सहुआ लेगल कुल उठवा के 
बाचल घर में धान के पइया। 
छुंछा के बा, के पुछवइया।

कइसे मनवा होई शीतल 
बून बून के तरसत बीतल 
घर क थाती कुल्ही ओराइल 
अंगना से भागल गौरैया।
छुंछा के बा, के पुछवइया।

भलहीं करबा केतनो बनिकी 
अब त हमरो माथा ठनकी 
एही बतकही भूख न मेटल 
कहिया ले का करबा भइया।
छुंछा के बा, के पुछवइया।
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अंक - 79 (10 मई 2016)

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