संपादकीय

लूर के पता - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

मत पूछ गुरु 
भकचोन्हर मातिन 
अइसन मालिक कहाँ ले खोजला 
कूल्हे संहतिया लसराइल बाड़े 
ओहनी के गतरे गतर 
पिटारा खुल रहल बा। 

रोवनी कलपनी 
भोर दुपहरी साँझ 
लूआर खलल डाली 
तराश बुझते नइखे 
मालिक के तिलक के बेरा 
जेकरा जवन हुलास रहल 
बिला गइल। 

मालिक त नीमने रहुवें 
उनका चारी ओरी वाला सब 
केतना नीमन बा?
कुल उतिराए लागल 
अतराइल बाड़े सन
कुछ अन्हराइलों बाड़े 
ओहनी के अपने 
लूर के पता नखे। 

कबों होखबों करी 
शक सुबहा बरोबर बुझाता 
अरे नाही 
उ निश्चित बा
कबों पता ना चली।
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अंक - 79 (10 मई 2016)

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