संपादकीय

एही होरिया में - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

मनवा के भीतरी के खुन्नस मेटाइब 
दुअरे दुअरे जाई के फगुओ सुनाइब 
करबे जी भर धमाल एही होरिया में। 
उड़ी अबीर गुलाल, एही होरिया में॥ 

सगरों सिवनवाँ मे सरसों फुलाइल 
ललका पलसवो बने मे इतराइल 
होइहें धरती खुसहाल एही होरिया में। 
उड़ी अबीर गुलाल, एही होरिया में॥ 

आमवा के मोजरी पर कोइलर कुंहुकल 
मनवा बा मातल देहियों बा महकल 
निरखे गोरिया निहाल एही होरिया में। 
उड़ी अबीर गुलाल, एही होरिया में॥ 

मसती मे मातल नवकों पुरनको 
जगल अरमान न सुधरल जवनको 
डाहे लाले लाल गाल एही होरिया में। 
उड़ी अबीर गुलाल, एही होरिया में॥ 
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अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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