संपादकीय

गमछा पाड़े -3 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"


पाड़ेजी अपना आफिस में पुलिस के पास से मिलल कापी फाइल से माथा पच्ची करत रहलन कि बहरी से ठलुआ चाय ले के अइलस अउरी टेबल पर रख के पाड़ेजी के तनिका देर निहरला क बाद टोकलस,'गुरू हम त कहत हईं कि एह मामिला क छोड़ दऽ. बहुत पेचीदा हवऽ.'


एतना सुन ला पर पाड़ेजी ओकरा के घूर के देखले अउरी चाय के चुस्की लिहला का बाद इत्मीनान से जवाब दिहले, 'कऊनो पेचीदा नईखे बबुआ. कातिल तक त हम पहुँच चुकल बानी.'

'काऽऽऽऽऽऽ?' पाड़ेजी के जवाब ओकरा खातिर आश्चर्य से कम ना रहे, एकरा पहिले कि पाड़ेजी अउरी कुछ कहते चाहे ठलुआ के अउरी कउनो प्रतिक्रिया होखित ऊहाँ पंडिताईन जी आ गइली. कहली कि, 'बाप ना मारे मेंढ़की, बेटा तीरंदाज! तनी हमहूँ त सुनी कि के हौ कातिल?' पंडिताईन के आवाज अउरी आगमन से पाड़ेजी के मुहँ अइसन हो गइल जइसे बूझला चाय मे चीनी क जगहा नमक पड़ गइल होखे. 'अब साँप काहे सूँघा गइल ? बोलऽतार काहे नाहीं?'

'हम कतना हाली कहले बानी कि हमरा दिमाग के चैलेन्ज मत करीहऽ. तोहरे ना, सबका के कातिल के नामो मालूम हो जाई, अउरी सबका सोझा कातिल सबूत क साथे पकड़ियो लिहल जाई. बाकि एकरा खातिर अब तोहरो एगो काम करे के पड़ी.'

'ऊ काऽऽ?' अबकी अचकचाये के बारी पंडिताईन के रहे कि ई मामिला में उनकरो काम करे के पड़ी.

'मुहँ बन्द कर लऽ ना त माखी घुस जाई. रहल सवाल का करे के बा, त ज्यादा कुछुओ ना, बस कम से कम तीन दिना ले ठलुआ के भूल जा काहे से कि तीन दिना ले ई हमरा काम में बिजी रही.' एतना कहला क बाद पाड़ेजी, पंडिताईन के प्रतिक्रिया जाने क पहिलही ठलुआ के कानी में मुहँ लगा के कुछ फुसफुसाए लगले आ ठलुआ ध्यान लगा के अइसे सुने लागल जइसे कि ओकरा ले बुद्धमान मनई पाड़ेजी के कहीं ना मिली.

ठलुआ के सब समुझवला क बाद पाड़ेजी ओकरा हाथ में सौ सौ के पाँच गो नोट देके ओकरा के जाये क साथ साथ बहुत सावधानी से काम करे क सलाह दिहले. ओकरा बाद ठलुआ उहाँ से चल गइल आ पंडिताईन ओकरा के जात देखते रह गईली.

'ठलुआ गइल आ अब तीन दिना क बादे आई. अब एगो चाह अउरी पिया द त हमहूँ ड्युटी पर चलीं. महादेव बाबू का घर के लोग के खबर लेबे के बा.' पाड़ेजी के बात सुनि के पंडिताईन मुँह बनवली अउरी झटकारत के 'हूँ' कहत आफिस से बहरी चल गइली. पाड़ेजी एक पल ले दरवाजा का तरफ देखला क बाद आपन सामान बटोरे लगले आ फेर कुछ बड़बड़ात सामान लेके बहरी चल गइले. जइसे उनका पंडिताईन क हाव भाव से अंदाजा हो गइल रहे कि फिलहाल चाय त का पनियो ना मिली.

महादेव बाबू क घरे दलानी में सब लोग बइठल रहे आ पाड़ेजी एहर ओहर टहलत आपन बात कहत रहलन, 'जईसन कि सबका के मालूम बा, महादेव बाबू क लाश जवन हालात में मिलल ओ हालात में मौत के कारन सिर्फ अउर सिर्फ आत्महत्या हो सकेला. बाकि बन्द कमरा में पंखा से लटकत लाश का साथे साथे टेबल पर राखल शराब का गिलास में जहर मिलावल शराब मिलला से मामला पेचीदा हो गइल बा.' एतना कहला क बाद पाड़ेजी बारी बारी से सबकर चेहरा पढ़े के कोशिश करे लगले. बाकि कुछ समझ में ना अईला पर फेर कहे शुरु कइले, 'साथे साथे पुलिस के ई भी कहना बा कि महादेव बाबू के दिल के दौरो पड़ल रहे. बाकिर ....?' एतना कहला का बाद पाड़ेजी एक बार फेर रुकले आ सबकरा के देखे लगलें. 'लेकिन का गमछा चच्चा..?' अबकी बेर पारी पाड़ेजी का कुछ अउरी कहला का पहिलहीं ममता अपना जगह बइठले बइठले सवाल कईलस, 'लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट त ई कहत बा कि महादेव बाबू के मौत दम घुटला से भइल बा.'

'आ शायद इहे एगो कारण बा कि पुलिस खातिर ई वारदात एगो बुझऊवल बनके रह गइल बा. बाकि हमरा खातिर ना.' एतना कह भईला पर पाड़ेजी जेकरा सामने रुकले ऊ ममता रहे. तनिका देरी ओकरा के निहारे के बाद पाड़ेजी ममता से कुछ पुछे लगले, 'हम सुनले बानी कि तू साइंस के पढ़ाई करत बाड़ू आ तोहरा विषय में रसायन शास्त्र मुख्य बा.'?;

'जी,, लेकिन??' सवाल के जवाब देबत खानि ममता क चेहरा पर बेचैनी आ गइल.

'बेसी हलकान होखे के दरकार नईखे. बात एतने बा कि महादेव बाबू के शराब का गिलास में जवन जहर मिलल बा ऊ जहर तोहरे जईसन मनई के आसानी से मिल सकेला.'

'का???' ई बात सुन के सब पाड़ेजी के आश्चर्य से देखे लागल अउर पाड़ेजी आपन पान मसाला खाये में बिजी हो गइले.

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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 78 (03 मई 2016)

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