संपादकीय

एक चिटुकी पिसान - केशव मोहन पाण्डेय

जिनगी
खाली तइयार रोटी ना हs
पानी हs
पिसान हs
रात के अन्हरिया पर
टहकत बिहान हs
कुदारी के बेंट पर
ठेहा लागल हाथ हs
कोड़-झोर कइला पर
सगरो बनत बात हs
बैलन के जोत हs
हर हs
पालो हs
इहे रीत चलेला
अथक सालो-सालो हs
जे दुर्गुण के चेखुर
नोच-नोच फेंकेला
शीत-घाम-बरखा में
अपना देहिया के सेंकेला
ज्ञान-संस्कार के
खाद-पानी डालेला
निरख-निरख गेंहुआ के
जान के जोगे पालेला
बनरी आ मोंथा के
उगहूँ ना देला जे
नेह के पानी सींच-सींच
गलावे सगरो ढेला जे
ऊहे मधु-मिसरी
रोटीया में पावेला
इस्सर-दलिद्दर के
सबके ऊ भावेला
ऊहे बुझेला असली
मन-से-मन के भाषा का,
ऊहे बुझेला
जिनगी के परिभाषा का?
त खेतवा बचाई,
बचाई किसान के
नाहीं तs ,
हहरे के परी सबके
एक चिटुकी पिसान के।।
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख, 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण, 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com
अंक - 44 (8 सितम्बर 2015)

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