संपादकीय

संपादकीय: अंक - 79 (10 मई 2016)

अश्लीलता कऽ चरचा कऽ बीच में 

आज-काल्ह चारों ओर; चाहे अखबार होखे भा सोशल मिडिया; भोजपुरी साहित्य, संगीत अउरी फिलिमन में ढूक आइल फूहरपन कऽ चरचा अउरी बिरोध हो रहल बा। जदि धियान से देखल जाओ तऽ ई चरचा अउरी बिरोध संगीत अउरी फिलिमन में आइल फूहरकम से ढेर बा। लेकिन इहो सही बा कि बिना साहित्य कऽ फिलिम अउरी लोकसंगीत संभव नईखे। एसे ई चरचा अउरी बिरोध घूमा-फिरा के साहित्य में आइल फूहरपन से जोड़ा गइल बा। 
कुछ लोग ए फूहरकम के खतम करे खाती अभियान भी चला रहल बा। ओ लोगन के ए बात के बधाई देबे के चाहीं कि ऊ सभ लोग आगे बढि के भोजपुरी में ढूकल गंदगी से लड़े के कोसिस कर रहल बाड़े। ई बहुत जरूरी बा काँहे कि घर के बाहर निकलते कान फोरे वाला फूहर अउरी घटिया गाना कान में तबले हिनहिनात रहेला जबले आदमी फेर से घर में ना समा जाओ। कुछ लोग तऽ अइसन फूहर गानन के दोसरा के घरो में जबरजस्ती ढकेल देलें। 
खैर। आज ए बिसय पर चरचा कइल जरूरी बा कि काँहे भोजपुरिया साहित्य, संगीत अउरी फिलिमन में एतना फूहरपन समा गइल बा अउरी ओकरा सङगे-सङगे भोजपुरिया समाज भी ओही रंग में रंगा गइल बा कि घर में माई-बहिन-बेटी बइठल रहेले अउरी लोग बिना कुछ सोचल बेसरमी के सङगे एक से एक फूहर गाना जोर-जोर से बजावत रहेला जइसे कि केवनो भजन बजा रहल बाड़े? घर होखे भा बाहर सभ जगह एगही हाल बा। कुछ पढल-लिखल मेहरारू ए बात के बिरोध करेली स लेकिन ई बिरोध बहुत कम लोगन के सुनाला अउरी ऊ सभ मेहरारू ए ओर धियान दिहल छोड़ि के अपनी दुनिया में भुला जाली सऽ भा चुपचाप मुड़ी नवा लेली सऽ। का एकरा खाती गाना लिखे वाला दोसी बा भा गाने गावे वाला? कि दोसी ई सभ फूहर गाना सुने वाला लोग बा? 
दोसी तऽ सभ बा। गाना लिखे वाला, गाना गावे वाला अउरी गाना सुने वाला लेकिन बड़हन दोसी गाने सुने वाला लोग बाड़ें। ई ऊ लोग बाड़े जेकरा एतनी बात के खियाल नइखे कि उनकर महतारी, बहिन, मेहरारू अउरी बेटी के ई सभ फूहरकम नीक नइखे लागत तबो ऊ शान से मुड़ी उठा के ई सभ फूहरकम फइला रहल बाड़े। 
आदिमी के सुभाव होला कि ऊ आपन दोस दोसरा पर फेंके के कोसिस करेला लेकिन ई कइला से आदिमी दोस से छुट ना जाला बलुक ओकर दोस अउरी बढि जाला। इहे ए बेरा भोजपुरिया समाज में हो रहल बा। लोग फूहर गाना लिखे अउरी गावे वाला लोगन के दोसिहा बना के आपन दोस छोड़ा रहल बाड़ें। एसे काम ना चली। जदि भोजपुरिया समाज ई चाहत बा कि ई फूहरकम खतम होखे तऽ ओकरा आगे बढि के फूहर गानन के सुनल बन करे के परी। अगर ई ना कऽ सकेला तऽ ओकरा फूहरकम के बिरोध करे के केवनो अधिकार नईखे। अउरी इहो जरूरी बा ऊ भोजपुरिया लोग जे फूहरकम के बिरोध में लड़ रहल बाड़े ऊ आपन बात भोजपुरिया समाज में ले के जाओ। खाली गाना-बजाना के बिरोध कइला से कुछ ना होई बलुक सगरी अभियान के दिसा बदल जाई। 
जदि हमनी के दुनिया के केवनो भाखा के देखीं जा तऽ ई साफ हो जाई कि हर भाखा में दू गो धारा बे जेवना में एगो साफ (श्लील) बे तऽ दोसरकी फूहर (अश्लील) बे। श्लील के मतलब ई ना होला कि देंह के बात होखेब ना करी अउरी अश्लील के मतलब इहो न इखे कि बिना देंहि बात सगरी श्लील होखेला। श्लील अउरी अश्लील एह बात से तय होला कि कइसे ओह बिषय के सोझा रखल गइल बा। जदि खाली देंहि के बात बा तऽ विद्यापति, निराला, बाणभट्ट अउरी कालिदास आदि देंहि के अनघा बरणन कइले बा लो बाकिर इनकर साहित्य अश्लील ना कहाला अउरी बहुते साहित्यकार बा लो जे देंहि के कहीं नाँव तक ले नइखे ले ले बाकिर उ अश्लील कहा लो अउरी बात सहीओ बा। साहित्य से देंहि अउरी संबन्ध के ना खतम कइल जा सकेला। ई ओकरा सिंगार कऽ हिस्सा हऽ बाकिर जरूर बा कि ई सिंगार कइल केङने बा? 
भोजपुरी लिखे-पढ़े वाला लोग हिन्दी में पढबे-लिखबे करे ला। हिन्दी में एगो उपन्यास बा नाँव हऽ ‘गुनाहों का देवता’। एके धर्मवीर भारती जी लिखले बानी। ई हिन्दी के कुछ सभसे मशहूर उपन्यासन में से एगो उपन्यास हऽ अउरी सायदे केवनो हिन्दी साहित्य परेमी होई जे एके ना पढले होई। लेकिन जब ई उपन्यास बाजार में आइल तऽ एकेरा के बहुते हिन्दी साहित्यकार लो अश्लील कहल लो अउरी खुब बिरोध कइल लो। बाकिर धीरे-धीरे सभ बिरोध खतम हो गइल अउरी धर्मवीर भारती हिन्दी के बड़हन लेखकन मे शुमार हो गइलें अउरी ‘गुनाहों के देवता’ से जुड़ल अश्लीलता के सगरी विमर्श खतम हो गइल। लेकिन कुछ किरांतिकारी लोग आगे बढि के एह उपन्यास के किरांतिकारी बनावे के परियास कइलें। ई ऊ लोग रहे जे फूहरकम के मीठकी गोली लोगन के खियावत रहे लेकिन किरांति के सितुही से अउरी आखिर में स्त्री विमर्श के नाँव से किरांति कऽ के मनलें जेवन किरांति जंघस्थल से वक्षस्थल के बीच के दूरी नापे व्यस्त हो गइल अउरी जब ई बुझाइल कि कहीं कुछ गबडाता तऽ स्त्री के सोझा मरद दुश्मन नियर खड़ा कऽ दिहलें। पर एतना जरूर क इले कि श्लील अउरी अश्लील के सगरी विमर्श खतम कऽ दिहलें। इहे कारन बा की आज श्लील अउरी अश्लील बात हिन्दी में ना होखेला। दोसरका कारन ई बा कि आजादी के पहिले अउरी बादो में हिन्दी में स्तरीय साहित्य खुब लिखाइल। निर्मल वर्मा, अज्ञेय अउरी मुक्तिबोध जइसन अनेकन लोग विर्मश के धारा बदलि दिहलें। 
एहीङने जदि रुसी साहित्य के बात कइल जाओ तऽ एगो रुसी उपन्यास बा ‘लोलिता’। ई उपन्यास जब आइल तऽ चारों ओर हहाकार मचि गइल। बहतु लोग ए उपन्यास के बिरोध कइले लेकिन कुछ किरांतिकारी लोग अउरी पढे वाला लोग विर्मश के नाँव पर एके मुख्यधारा के उपन्यास बना दिहलें। आज सायदे केवनो अइसन भाखा होई जेवना में ए उपन्यास के अनुबाद नइखे भइल। अइसन हजारन गो उदाहरन मिल जाई। 
एही तरे पंजाबी लोकगीत पर धियान दिहला से ई साफ-साफ लउकता कि गुरुदास मान से पहिले अश्लील गीतन के बोल बाला खुब रहे बाकिर एगो गुरूदास मान अउरी बाद में दलेर मेंहदी पुरा पंजाबी लोकगीत के दिशा बदलि दिहलें। अउरी आज पंजाबी लोकगीत के तूती बोल रहल बा। आजो पंजाबी में अश्लील लोकगीत गावल अउरी बजावल जाला बाकिर दुसरकी धारा एतना बरिआर हो गइल बा कि ओह ओर केहू के धियाने ना जाला। अउरी अइसन खाली पंजाबी के सङगे नइखे बलुक इहे हाल दुनिया के बाकी सगरी भाखन के बा। 
जदि भोजपुरी के लोकगीत के अतीत के बारे में बात कइल जाओ तऽ ई एकदम साफ-साफ एक से एक बड़ कलाकार भोजपुरी लोकगीतन के गावे चाहत रहलें। हिन्दी फिलिम के मुकेश, मन्ना डे, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, आशा भोसले अउरी किशोर कुमार जइसन गायक होखस भा पं छ्न्नूलाल मिश्र अउरी गिरजा देवी नियर शास्त्रीय संगीतकार सभकरा मन में भोजपुरी लोकगीत के ले के सम्मान के भाव रहे अउरी सभ केहू शान से भोजपुरी लोकगीतन के आवाज देले बा। मन्ना डे के ‘लाली-लाली होठवा से चुएला ललईया हो’, लता मंगेशकर जी के ‘रखिया बंधा ल भइया सावन आईल’, आशा भोंसले के ‘एक तो चढ़ल जवनिया’, किशोर कुमार के आवाज में ‘जाने कईसन जादू कईलु मंतर देहलू मार’ रफी जी के ‘गोरकी पतरकी रे’, भा मुकेश कऽ ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ जइसन गीत आज ले लोगन के जुबान पर बा। कुछ भोजपुरी गीत तऽ हिन्दी फिलिमनो में बा। तऽ सवाल खड़ा होता कि आखिर अइसन का हो गइल कि भोजपुरी में अश्लीलता फइल गइल। 
एसे भोजपुरी में श्लीलता अउरी अश्लीलता के बात केवनो नाया चीझ नइखे। भोजपुरी साहित्य के सङगे सभसे बरिआर बेमारी ई बा कि स्तरीय साहित्य बहुत कम लिखाइल बा। भोजपुरी के क्षैतिज बिकास तऽ खुब भइल बा बाकिर एकर उर्ध्वाधर बिकास ना भइल। पिछिला सौ साल में अंगुरी पर गीने भर कुछ बढिया साहित्यकार भइले अउरी संत साहित्य के छोड़ दिहल जाओ तऽ भोजपुरी के लगे बाँच जाता उहे अश्लील साहित्य जेवना के रचना पिछिला दू दसक में खुब भइल बा। इहे कारन बा आज भोजपुरी में अश्लील ढेर लउकत बा। बाकिर जइसहीं भोजपुरी के दोसरकी धारा बरिआर होखे लागी अश्लील अउरी श्लील के सगरी विमर्श एकगरी हो जाई। एसे बरिआर काम ई बा बढिया साहित्य लिखल पढल जाओ अउरी ओके हाथो हाथ लिहल जाओ अपनी गुट से बाहर निकल के अउरी बेवजह बिरोध करे के सुभाव के कोठीला में बन कऽ दिहल जाओ। ना तऽ विमर्श चलत रही अउरी ओही तरे टंगरी खिंचात रही अउरी अश्लील गीत कान में फेंटात रही। 
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अंक - 79 (10 मई 2016) 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक। हाँ एगो बात बा बरियारी ना करी त भोजपुरी में सरिया के सजाव दही लेखा साहित्य के सृजन 1942 ई से मान साकिला। देखल जाय त शैक्षणिक स्तर पर लेखन बहुत हाल के बा। एही से हम कहब कि भोजपुरी साहित्य अभियो बनही के दिसाई बढ़ रहल बिया। रहल बा अश्लील के त इस सभ साहित्य में बा का संस्कृत होखे भा का अवहट्ट। मैथिली होखे भा हिंदी भा अंग्रेजी। लेखन होत रहे। हंस लेखा बढ़िया चीज के चुन लेवे के बा।

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    1. संतोष भाई हम सहमत बानी अउरी हमहूँ इहे कहत बानी। अश्लीलता के हउआ बनावला से कुछ ना होई। होई बढिया साहित्य के खोजला अउरी लिखला से।

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  2. बहुत सटीक। हाँ एगो बात बा बरियारी ना करी त भोजपुरी में सरिया के सजाव दही लेखा साहित्य के सृजन 1942 ई से मान साकिला। देखल जाय त शैक्षणिक स्तर पर लेखन बहुत हाल के बा। एही से हम कहब कि भोजपुरी साहित्य अभियो बनही के दिसाई बढ़ रहल बिया। रहल बा अश्लील के त इस सभ साहित्य में बा का संस्कृत होखे भा का अवहट्ट। मैथिली होखे भा हिंदी भा अंग्रेजी। लेखन होत रहे। हंस लेखा बढ़िया चीज के चुन लेवे के बा।

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