संपादकीय

देवेन्द्र आर्य जी कऽ तीन गो गीत

मोंछ

मोछिया केतनो बाढ़ी
नकिया के निचवे रही।

ई हैं के
ई हउएं हाकिम इहवां के बड़का
ई हैं के
इे सेठ-साहूकार हउएं मोटका
ई हैं के
ई झारे जालें गाँव गाँव टोटका
इनहन के गुमान बा 
डेराइ जाई छोटका

जनता हमार हउए जइसे हनुमान जी
जनता के जोर बल करिं अनुमान जी
जब्बे जिदिआई
लेवे-देवे के परी।

मोछिया रखावे बदे 
कटी नाहीं नकिया
नकिया रखावे बदे 
बिकी ना इज्जतिया

जुड़वा सजावे बदे खेतवा बिकाई ना
देवता चढ़ावे बदे मनई कमाई ना

अगिया मसान जइसन 
बरि जाले भुखिया
पेट के अगिनिया में 
जरि जाले मोछिया

पेटवा जुड़ाई
तब्बे नकियो रही।
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देवर-भाभी संवाद

सुरुज के डुबले
किरिनिया के सुतले,
भउजी न छोडि़हा दुआर हो
खेते-खलिहाने तू अकेले जिनि जइहा
ढुकल होइहें हुड़ार हो

दाग लगि जाई जे इज्जतिया पर तोहरे
झुकी गरदनिया हमार हो
नीक बाउर, रुख-सूख जउने हम कमाइब
ओतने में चली घर-बार हो

हुड़रा के डर
डर ओसे कहीं जादे
जिनगी हो जाई अखबार हो
हमरे मड़इया के भउजी तू लक्ष्मी
कारिहा इ बतिया बिचार हो।

कबले न जाईं बाबू खेते-खलिहनवा
कबले न करब बजार हो
नाहीं हम रानी नाहीं हम पटरानी
मिलि जइहें व्यंजन हजार हो

इहां नाहीं, उहां नाहीं
नाहीं नाहीं करके कइसे चली इ संसार हो
एतना डेरइबा जे इज्जतिया के बाबू
घरवा में लोटिहें सियार हो

कबले रखइबा बाबू कबले बचइबा
हुड़रा से इज़्ज़्ात हमार हो
बिना तेल-बाती के न हईं हम लक्ष्मी
पइसा बिना सब अंधियार हो

आपन कमाई खाइल नगद ए बाबू
आन के खाइल उधार हो
हाथ-गोड़़ आछत हमार होई जाई
सोना अस जिनगी बेकार हो

हमके न नीबर समझिहा ए बाबू
हम हईं बिजुरी के तार हो
हम नाहीं पढ़ल-लिखल बबुआइन
सहलेब जुलुम के मार हो

पेरब आपन जंगरा
कमाइब आपन रोटिया
हमके अजदिया से प्यार हो

खूब हम चीन्हीला हुड़ार के सकलिया
ओकरा से हईं हुसियार हो
हुड़रा के देहिंया से मनई के खुशबू
अखिया से टपकेला लार हो

मोछी में हुड़ार कहूँ 
बरदी में हुड़ार कहूँ
कहंवो बा टोपी में हुड़ार हो
जहाँ-जहाँ रुपिया के झाड़-झनखाड़ उगे
तहाँ-तहाँ मिलिहें हुड़ार हो

जबले झुकइबा बाबू आपन गरदनियाँ
हुड़रा के होई भरमार हो
नाहीं हम अकेला हईं नाहीं हम निहत्था
हमहूँ धरीला हथियार हो

ओकरे गरदनिया पर हम तेज करबें
अपने हंसुअवा के घार हो।
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दचक्कू

मोरे सइयाँ गये हैं बजार 
चक्कू लावै को।

चक्कू ले अइहैं तो तुमका बतइहें
मोरे सइयाँ खोजे उधार
चक्कू लावे को।

चक्कू रखे से रोब पड़त है
सइयाँ बेचि आये अंगना-दुआर
चक्कू लावै को।

हवा-बतास, न रोटी पानी
खेतन में लोटें सियार
चक्कू लावै को।

लउटे तो हाथन में पट्टी बंधी थी
उंगली कटी देखन में धार
चक्कू लावै को। 

देखी-देखा सइयाँ के सब लइ आए
हुई बस्ती में चक्कू की मार
चक्कू लावै को।

बस्ती उजडि़ गई, दुई जने बसि गए
शहरी लाला अउर जमींदार
चक्कू लावै को।
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लेखक परिचय:-

नाम: देवेन्द्र आर्य
पता: ए - 127, आवास विकास कालोनी 
शाहपुर, गोरखपुर – 273006
मोबाइल: 09451565241 आ 09794840990
मेल: devendrakumar.arya1@gmail.com

अंक - 77 (26 अप्रैल 2016)

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