संपादकीय

खेदारु काका - अभिषेक यादव

बकरी बेच, भइल बियाह खेदारु काका के,
आज़ादी से पहिले इनका घर ना रहे पाका के 

घर ना रहे पाका के ऐहि से होखे सकेता;
नावा-नहर कनिया के सभे झांक लेता।

सभे झांक लेता, इज्जत का अब रही?
काका के मन-मथऽता अब केसे हम कहीं?

अब केसे हम कहीं मन में कलह-क्लेश,
कवना जगह पलायन कवन धरीं भेष?

कवन धरीं भेष पहचाने ना कोई,
चिरई-चौवा, मैना-कौवा अउर कोई ना होइ।

अउर कोई ना होइ निर्जन जगह पेयान,
हमार दुलही संगे-२ हम राखेब धेयान।

हम राखेब धेयान रहेके अकोरा में,
इहे सोच खेदारू का भरे लगले झोरा में।

भरे लगले झोरा में गहना-गुरिया, लुगरी
काका चलस आंगे-२ पीछे काकी मुनरी।

पीछे काकी मुनरी काका के अध-अंग,
जिनगी के हर डेग प देत रहली संग।

देत रहली संग तन-मन आ धन से,
काकी चलस धीरे-२ काका चलस मन से।

काका चलस मन से, जंगल बीच पहाड़,
झाड़-फूस जोगावऽतारे करे खातिर आड़।

करे खातिर आड़ जंगल बीच निवासी,
अब त मज़े-माज़ा बा सोचे कका बिस्वासी।

सोचे कका बिस्वासी कछु दिन बितल रात,
कंद-मूल से पेट भरे कहाँ मिलऽता भात?

कहाँ मिलऽता भात गांव ईयाद आवे,
रात-२ जगले बीते कुकुर,सियार डेरवावे।

कुकुर,सियार डेरवावे भाँति-२ के शोर,
अब त हिया कुहुकता मन प कवन जोर?

मन प कवन जोर कइले जे नादानी,
अनबोलता काकी चुप-चाप झेलऽतानि।

चुप-चाप झेलऽतानि कहली एगो बात,
'सुनऽतानी ऐ जी घरवा बड़ी सोहात।'

घरवा बड़ी सोहात इहाँ निक ना लागे,
जइसे विप्र सुदामा ओइसे काका भागे।

ओइसे काका भागे लेहले घर के सुध,
देखते माई-बाऊ के हालत भइल बेसुध।

हालत भइल बेसुध लइका भईल जोगी,
झोटा-दाढ़ी झूलता फटल चीर वैरागी।

फटल चीर वैरागी बात समझ न आवे,
इधिर काका लजने कछु न कहऽतारे।

कछु न कहऽतारे मौनी बाबा खेदारी,
पीछे से मुनरी काकी आइल बाड़ी दुआरी।

आइल बाड़ी दुआरी हाथ में मोटरी धइले,
सास-ससुर ख़ुशी-२ साँझ बइठकी कइले।

साँझ बइठकी कइले कतना भइल कमाई?
भीतरे-२ पीरऽता काका गइले अझुराई।

काका गइले अझुराई खइले किरिया सोझा,
धन-गठरी चोरी भइल बताई केहू ओझा।

बताई केहू ओझा बात हो गइल गोल,
अब त काकी चेतस इ कवन बा झोल?

इ कवन बा झोल बात गइल मुरझाय,
काका-काकी संगे-२ जिनगी रहऽ बिताय।

जिनगी रहऽ बिताय हो गइले अब बूढ़,
बड़ी शान ह गऊवाँ में भईल करेजा जूड़।
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अभिषेक यादव











अंक - 73 (29 मार्च 2016)

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