संपादकीय

केहु से बाट रजा - तेग अली-तेग


केहु से बाट रजा तु सटल सुनत बाटी

ई काम करत नाही निक हम कहत बाटी॥
सहर मे बाग मे उसर मे बन मे धरती प
तूँ देखले हौअ बंडर मतिन फिरत बाटी॥
ना कवनो काम करीला ना नौकरी बा कहूँ
बईठ क धुर क रसरी रजा बटत बाटी॥
कहे लै फुल के गजरा त सभ केहु हमके
पै तोहरे आंखी मे कांचा मतिन गडत बांटी॥
नाही मुये मे लगवलs रजी तूँ कुछ धोखा
पै आंखि मुन के देखीला तब जिअत बाटी॥
ना घर तु आव लs हमरे ना त बोलाव लs
ए राजा रामधै तोहसे बहुत छकत बाटी॥
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अंक - 65 (2 फरवरी 2016)

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