संपादकीय

कि सिकड़ी बस केवाड़ चढ़लऽ बा - राजीव उपाध्याय

सड़क चले ले, जब-जब गँऊवाँ के ओर
तब-तब गाँव के भितर शहर घूसेला।

जेसे हावा, पानी औरी अदिमी
सबके सब अँहियाला, बहकेला॥

आपन नाँव-गांव अउरी पहिचान सगरी
बान्ह के ले घूमेला गठरी-गठरी
जेवन कबो-कबो खूलेला॥

महतारी तब
निकलि के बहरि पूछेलीं -
“का बाबू का हाल बा
देखऽ फइललऽ केतने तवाल बा।
छोड़ऽ खोलऽ आपन गठरी
धऽ लऽ गाँव के डहरी।”

कि अचके से नीन खूलेला
दीद चारू ओर बहेला, पावेला
कि घर उहे बा
गाँव उहे बा
कि सिकड़ी बस केवाड़ चढ़लऽ बा
कि भीतर एगो मनई सुतल बा॥
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लेखक परिचय:-



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लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
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अंक - 49 (13 अक्टूबर 2015)

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