संपादकीय

डाला के साइत - जनकदेव जनक


‘‘का बबुआ, बारात के तइयारी भइल कि ना ? ’’
‘‘हां भइया तइयारी त चल रहल बा. वैसे कलेवा के सामान सहेज के रखवा देले बानी. अब बिहौती सामान कीने के रह गइल बा.’’
‘‘कवन-कवन सामान खरीदे के बा, जरा हमहूं त जानी बबुआ!’’ सवेरे सवेरे अपना मुंह में दतुवन के हुड़ा करत शिव रतन भइया हमरा घर के सहन में पड़ल चउकी पर आके बइठ गइले आउर हमरा उत्तर के इंतजार करे लागलें.
‘‘ भइया , दूल्हा के पोशाक त पहिले से ही तइयार बाटे. जमाना के अनुसार लक्ष्का के कोट, फुल पैंट, गंजी, जाघियां, तौली, टाई, जूता, मोजा आदि बनवा दिहले बानी. काल्ह बाजार से सिंहोरा, दउरा, ताग पात, सिरमउर, माला, पगड़ी, इतर, गुलाब जल, सेंट आदि भी कीन लाइल बानी.’’
‘‘ सब तो बिढ़या कीनले बाड़ हो बबुआ, बाकिर डाला बनावे के साइत चंद्रिकवा डोम के देले बाड़ कि ना .’’
‘‘ अरे भइया, आज काल्ह जब सब कुछ बाजार में उपलब्ध बात फेरू डाला के साइत देला के का जरूरत बा. रउरा जादे माथा पच्ची करे के जरूरत नइखें. आज सांझ के बाजार से ऊहो कीन के लाइब. रउरा एकदम बेफिकीर रहीं. हम अपना मकान के सहन में रहेठा के खरहेरा से झाड़ू लगावत शिव रतन भइया से बोल पडनीं
‘‘हम मानत बान कि शहर में रह के तु बहुत समझदार हो गइल बाड़. बाकिर शादी बिआह के मउका पर गांव के रसम रिवाज अलगे मायने रखेला. बहुते चीज हमनी के ‘पउनी ’ लोग से मंगावे के पड़ेला. एकरा बदला में उ लोग नेग चार ,सीधा आदि मांग के ले जाला. ई तो बताव कि बबुआ के शादी कवना तिथि के बाटे?’’ भइया हमरा के समुझावत पूछलें. 
‘‘ तिथि त हमरो मालूम नइखे. बाकिर बारात छह जून के निकली. ’’
‘‘ अरे बाप रे, आज त तीन तारीख हो गइल. अभी तकले तु डाला के साइत ना भेजवइल. अब सब काम छोड़ के तु चंद्रिकवा के इहां चल जा, शहर में भले डाला मनिहारी के दोकान में मिल जात होई, बाकिरा इहां ओकरे इहां डाला मिली. वह थोड़ा मुंहजोर हटे. भइया थोड़ा सा चिंतित होत हमरा से बोललें. ‘‘चंद्रिका जी कहवां रहेलन? हमरात कुछो पता नइखे. फेरू हम उनुकरा के कहवा ढूंढ़त फिरब. ’’ हम भइया से पूछनी.
‘‘ धत्त तेरी के, तू चंद्रिकवा डोम के नइख जानत? खैर कवनों बात नइखे. तू सीधा बनपुरा बाजार चल जा, नहर के किनारे डोम टोला बसल बा, ओही जा ऊ मिल जाई.’’
‘‘ भइया अगर डाला छोड़ देवल जाई तो काम ना चली का ? ’’
‘‘ आरे तू कइसन बुरबक नियर बात करत बाड़. कतही डाला के बिना बिआह होला. डाला त लक्ष्की के माड़वा के शोभा हटे. ओकरा बिना भारी जग हंसाई होई. ’’ भइया हमरा पर बिगड़त बोल पड़लें आ कहले,‘‘ जब दूल्हा के बारात निकले ला त कलेवा के गाड़ी के पीछे डाला बांधल जाला. आज कल बैल गाड़ी भा टायर गाड़़़़़़़ी के चलन कम हो गइल बा त लोग चार सौ सात ,जीप, र्ट्ेक्टर आदि के पीछा बांधत बाटे. ’’
‘‘ ठीक बोलत बाड़ भइया, डाला वाला गाड़ी के देखते अनजान लोग भी समझ जाला कि ई गाड़ी बारात लेके जात बिया. पहिले राम वेड सीता, राधा परिणय किशन लिखे के परिपाटी ना रहे. लोग लिखबों करे त एकरंगा लाल कपड़ा पर मैदा के लेई बना के रूई के फाहा से सुस्वागतम, शुभ बिआह आदि लिखे.’’
‘‘ ठीक समुझले बबुआ, अब बिना देर कइले चट पट भाग जा चंद्रिकवा के घरे. ’’
रउरा के बतावत चलीं कि हमरा बड़का लक्ष्का के शादी रहे.एकरे तइयारी में पूरा परिवार लागल रहे. अइसे त पूरा परिवार शहर में रहेला. बाकिर परिवार में कवनों तरह के जग परियोजन पड़ला पर गांव जाये के पडेला काहे कि गांवें में भाई भवधी के लोग रहेगा. बदलत परिवेश गांव आ शहर के बदल देले बा. अब त जे जहवां बाटे, ओही जा शादी-बिआह,जन्म मरण पर जग कर लेता.
खैर, हम आपन साइकिल निकलनी आ साइकिल के पैडल मारत बनपुरा बाजार के तरफ निकल पड़नी. सारन से सिरिस्तापुर, सिरिस्तापर से ताज पुर होत हम बुनपुरा मोड़ पर चहुंप गइनी. मोड़ पर एगो चाय के दोकान रहे. ओकरे सामने साइकिल के ब्रेक लगावत खड़े खड़े पूछ बइठनी,‘‘ भइया, डोम बस्ती केने बाटे?’’
बनपुरा बाजार के देखते हमारा भीतर के बचपन जाग उठल. जब सब्जी बेचे खातिर हम अपना बड़का बाबुजी के साथे बाजार जाई. 40-50 बरीस बाद हम इहां आइल रही. सब कुछ बदल गइल रहे. गलियन के कच्च सड़क अब पक्का रोड हो गइल रहे. सड़क के किनारे बिजली के पोल खड़ा रहे. बिजली के तार भी तानल रहे. बाकि बिजली के भरोसा ना रहे कि कब रही ना रही. बनपुरा बाजार से एकमा ,साहजित पुर जाये खातिर जीप, कार, टेंपो आदि लागल रहीस. पहिले ई सब सपना रहे. अब त सवेरे छपरा, सिवान आ पटना खातिर बस भी मिल जात बाड़ीस. पहिले बस पकड़े खातिर एकमा चाहे सहाजित पुर जाये के पड़त रहे. हम मन ही मन बनपुरा के इतिहास भूगाल में फ ंसल रही तले चाय वाला बोलल.
‘‘ भइया, बनपुरा बाजार जाये खातिर दु गो राहता बाटे. ’’ चाय वाला अपना ग्राहक के निबटवला के बाद हमरा से कहलस, हमार तंद्रा भंग हो गइल. हम ओकरा से फेरू पूछनी,‘‘ कवन राहता ठीक रही भइया?’’
ऊ बोलल कि बाजार के गली वाला राहता ठीक नइखे. पीसीसी जहां तहां टूटल बाटे. साइकिल से उतरे चढ़े के पड़ी. एही से बंगला के तरफ से जाये वाला दुसर राहता ठीक बाटे. आगे नहर के पुल बाटे. उहां चहुंप के नहर के पगडंडी पकड़ लेवे के पड़ी. ओकरा समुझावला के अनुसार हम बंगला वाला राहता पकड़ लेहनी. पुल पर कुछ लोग खड़ा रहे. ओह लोग से डोम टोला जाये के राहता पूछनी. जानकारी मिलल कि नहर के उत्तर वाला टोला डोम समुदाय के हटे. अब नगर के पगडंडी पकड़ के आगे बढ़नी. जबरदस्त घाम रहे. आषाढ़ के महिना शुरू हो गइल रहे. ओकरा बादो सूरज महाराज के ताप में तनकों कमी ना रहे. पसीना से लथ पथ हम आपन साइकिल बढ़ावत आगे बढ़त रहीं. नहर में पानी के टोटा रहे. नहर के पेटी में जहवां तहवां गढ़न में पानी रहे, कुछ लक्ष्का पानी उबिछत रहस त कुछ लक्ष्का पानी के हिंड़ोंड़ के गंदा करत रहस,ताकि मछरी उपर उग जा स. ताकि लक्ष्कन के मछरी मारे में सुविधा होई. सब लक्ष्कन के देह पांक में लसराइल रहे.
हम साइकिल चलावत डोम टोला चहुंप गइनी. पहिले उहां मूंज के पलानी, फूस के मड़ई आ खपड़ा के घर रहे. ओकरा जहे इंदिरा आवास बन गइल रहे. कुछ ईटा के मकान डोम लोग के आपन भी रहे. सुअरन के खोभार त रहे बाकिर देसी के जगे विदेशी नस्ल के सुअर रहस. हम एको पकड़ी के गाछ के नीच आपन साइकिल खड़ा कइनी. ओकरा में स्टैंड ना रहे, एह से साइकिल के पेड़ के जड़ में सटा के ओंठगा दिहनी. गाछ के छाया में कुछ लोग बइठल रहे. ओहमें से एक आदमी से हम पूछनी,
‘‘भइया, चंद्रिका जी के घर केने बाटे?’’ 
उहां बइठल लोग हमरा के अचरज के साथे देखे लागल. जइसे हमरा मुंह से कवनों गलत बात निकल गइल होखो. उ आदमी हमरा के नीचे से ऊपर तक देखलख,ओकरा बाद उल्टे हमरा से पूछ बइठल कि रउरा चंद्रिका जी के खोजत बानी के चंद्रिकवा डोम के ?
ओकर बात सुन के हम अकबका गइनी कि डोम बस्ती में जाके ओह आदमी के नाम असम्मान जनक भाषा में कइसे पूछी. हम अबही सोचते रही की का बोली ना बोली,तले उ फेरू बोल पड़ल.
‘‘हमरा बुझाता कि रउरा चंद्रिकवा डोम के खोजे निकल बानी. हमरे नाव चंद्रिकवा डोम हटे. बोली का बात बा?’’ हमरा के असमंजस में देख के उ आदमी टोकलस.
‘‘दरअसल हम त तोहरे के खोजे खातिर निकलल बानी. बाकिर पुकारू नाव के साथ जाति के नाव धरल ठीक ना लागत रल.एही से चंद्रिका जी बोल पड़नी ह.’’
‘‘ रउर एह तरी इज्जत के साथ हमरा के खोजब त समुचा दिन रउरा बंवड़ेड़ा लेखा नाचते रह जाइब.काहे कि ई गांव हटे शहर ना. एह गांव में झगरू भाई मुखिया ना हउवन. बाकिर लोग उनुका के मुखिया जी कह के पुकारे ला. ओही जा रहमान मियां ब मुखिया के चुनाव जीतल बाड़ी,बाकिर अभी तक उनकरा के लोग मुखियाइन कह के ना पुकारे ला. खैर, रउआ आपन बात बताई!’’
‘‘चंद्रिका भाई , डाला के साइत देवे के बा, ओकरे काम खातिर सारन से शिव रतन भइया भेजले बानी. ’’ हम पाकेट से पइसा निकाल के देवल चहनी, तले उ हमरा को रोक दिहले. पूछले कि कहिया शादी बाटे. हम जइसही कहनी कि छह तारीख के बाटे त उ मुंह बिचकावत बोल पड़ल,
‘‘ नाच बाजा, हाथी घोड़ा, टैंट शामियाना के साट्टा बायना हो जाला तब चंद्रिकवा डोम के इयाद आवेला. ना चाही साइत के पइसा..’’
‘‘चंद्रिका भाई हाथ में आइल लछमी माई के जाये मत दीहीं. ’’
‘‘ बाबू साहेब ,बेकार के निहोरा मत करीं. चुप चाप घर चल जाई आ शिव रतन भाई के भेज देहब,हम सब कुछ समझ लेम..’’एकाएक चंद्रिका गुस्सा के बोल पड़ल.
ओकर आवाज सुनके ओकर मेहरारू रिझनी आ बेटा भुअरा दउरल पकड़ी के गाछ तर आ गइले. भुअरा अपना बाप से पूछलस कि काहे चिल्ला चिल्ली होत बाटे. 
‘‘ कुछो ना रे भुअरा, शादी के तीन दिन रह गइल बाटे, तब इहां के डाला के साइत लेके आइल बानी. तेंही बताव कि तीन दिन में डाला कइसे बनी?’’
‘‘ हमार बाबू ठीक बोलत बाड़ें. बांस हमरा घरे नइखें नूं. कीन के लावे के पड़ी. ओकरा के फाड़ के कमाची बनावे के पड़ी. तब नूं जाके डाला बनीं. ’’ भुअरा अपना बाप के बात के समर्थन कइलस.
‘‘ चंद्रिका भाई, हमरा गलती के माफ करी. अइसे एक सप्ताह पहिले भइया साइत के पइसा मुरुलिया के देके तोहरा किहां भेजले रहस.बाकिर उ इहां ना आके दोसर चंद्रिका के इहां चल गइल...’’
‘‘ आरे ना आइल त हम का करीं.. ’’ बीचे में बात काट के चंद्रिका बोल पड़ले.
जायेदीं ए भुअरा के बाबू, जब बाबू साहेब आपन गलती मानत बानी त ..’’
‘‘ जब दु आदमी बोलत होखे त बीच में तीसर के घुस के चुदुरबुदुर ना करे के चाहीं भुअरा के माई,हम बाबू साहेब से झगड़ा नइखीं करत. आपना नेग चार खातिर लड़त बानी. अब तुहीं बताव भुअरा के मास्टर बनावे खातिर रहमान मुखियाइन कातना रुपिया मांगत बाड़ी ?’’
‘‘ एक लाख रुपिया . ’’ तपाक से भुअरा बोलल.
‘‘ ठीक टाइम से रुपिया दियाई तबे भुअरा मास्टर बनी. ना दियाई त ना बनी. ओही तरी बाबू साहेब टाइम बिता के अइल बानी त हम का करीं. ’’ चंद्रिका आपन पूरा बात कह देहलेन.
‘‘ चंद्रिका भाई, हमरा पर भरोसा करीं आ हमरो पूरा बात त कम से कम सुन त लिहीं. ’’
‘‘ ह मालिक, कहीं आपन पूरा बात. ’’ अपनापन जतावत रिझनी बोलल.
‘‘ आरे हां, उहे त बतावे जा रहीं, हमरा चचेरा भाई राजन के ससुरार सिकटियां बाजार में बाटे. उनकरों सार के नाम चंद्रिका हटे. मुरलिया बिना सुझ बुझ के साइत के पइसा उनका घर में दे आइल. ’’
अतना सुनते भुअरा आ ओकर माई जोर जोर से हंसे लागलें.
‘‘फेरू का भइल बाबू साहेब़ ?’’
‘‘आरे भाई भइल का, दुनू परिवारन में महाभारत शुरू हो गइल. ’’ अतना बोल के हम गाछ के निकल सोर पर गोर लटका के बइठ गइनी, काहे के खड़ा भइल भइल गोर दुखा गइल रहे.
‘‘आगे का भइल मालिक!’’ उत्सुकतावश रिझनी हमरा से पूछ बइठल.
‘‘ आरे भाई हम बानी कि चंद्रिका भाई बोलत बानी आ रउरा सभे बाबू साहेब आ मालिक बोलत बानी. ई का तमाशा होता!हमनी के त इंसान हईस, एहमें छोट बड़ के अंतर काहे. रउरा सबे आपन हीन बावना के तेयागी आ उमर के लिहाज से बबुआ, भाई जी, भइया, चाचा, दादा बोले के कोशिश करीं. काल्ह भअर बबुआ मास्टर बनिहें. बाकिर बंशागत संस्कार के धीरे धीरे बदले के पड़ी. अचार,विचार आ बेवहारे से आदमी देवता बनेला. ओकर सब लोग पूजा करेला. ’’ हम एके सांस में जवन जवन मन में आइल बक गइनी. बाकिर उहां बटोराइल जन समूह कवनों तरह के आपने विगोध भा सुझाव ना दे पावल. देर त खामोशी छवले रहे. जइसे हमरा बात पर लोग मन ही मन मंथन करत होखो. आखिर में हम ही खामोशी के तुड़नी.
‘‘अरे रिझनी बहन हम मुरलिया के बारे में का बतावत रही,तानी इयाद करी..’’
‘‘ बाबू साहेब..ना ..ना भइया.रउरा बतइनीह कि मुरलिया चचेरा भाई के सार के घरे डाला के साइत के पइसा दे आइल.’’उ थोड़का सा घबरा के बोलल.
‘‘ हां इयाद आइल, जब चंद्रिका जी आपना घर पहुंचले त उनकर मेहरारू सुनैना 21 गो रुपिया उनका हाथ में धरावत कहली कि अब हमनी के डोम हो गइनीस का कि सारन से डाला बनावे के साइत के पइसा आइल बाटे.’’
‘‘ अरे तोहार दिमाग खराब हो गइल बा का? कि आवते आवते नटी पर चढ़ गइलू. जीजा जी पर असन इलजाम लगावत बारू, हम अबही मोटर साइकिल उठा के सारन जात बानी आ एह बात के पता लगावत बानी !’’
अतना कहत चंद्रिका जी आपन मोटर साइकिल के कीक दबवलें आ फटफट करत सारन के तरफ निकल पड़े.
जब सारन पहुंचले त संयोग से घर में उनकरा बहिन आरती के अलावा केहूं ना रहे. उ आपन खीस ओकरे पर उतलें,
‘‘ का रे अरतिया तोरा बिआह के बाद से हमनी के जात बदल गइल बा का कि इहां से मुरलिया डाला बनावे के साइत लेके गइल रल.’’
आरे भइया, काहे अगिया बैताल भइल बाड़,गुस्सा थूक द आ नास्ता पानी कर. हम लावत बानी..’’
‘‘जबले जीजा से एह बात के फैसला ना हो जाई,हम तोरा घर के पानी तक ना छुअब. इज्जत के सवाल बाटे पता सारन वाला लोग अपना के का सोचेला’’
‘‘ अरे भइया, तोहार जीजा हमनी के डोम बना दिहले बानी, अब हमहूं एह घर में एक छन भी ना रहब, तोहरे साथे हमहूं चल चलेब..’’
भाई बहिन में नोक झोक होते रहे तले कतही से घूमत घूमत मुरलिया उहां चहुंप गइल आ चंद्रिका मामा के देख के गोर छू के पान लगलस.आ बोल पड़ल,
‘‘मामा हमरा से गलती हो गइल बाटे, माफ कर दी.’’
‘‘ कावना बात के माफी मांगत बाड़ मुरली?’’ चंद्रिका जी मुरलिया के मायूस चेहरा देखके नरम पड़ गइले.
‘‘ मामा, जब हमरा साइत के पइसा मिलल त ओह टाइम हम एफएम रेडियो पर लोक गीत सुनत रही. चंद्रिका जी के माने हम सिकटियां समझनी आ साइत के पइसा मामी के दे अइनी.हमरा ना मालूम रहे कि डाला बनावे वाला पउनी के नाम भी चंद्रिका हटे. ’’
गिला सिसकवा भुला के चंद्रिका जी ओकरा के अंकवारी में बांध लेले आ बोल पड़ले कि ते ना अतीस मुरली त पता ना आज सार बहनोई में महाभारत जा के कहवा रुकित.
एह बात पर चंद्रिका डोम, उनुकर मेहरारू रिझनी आ बेटा भुअरा हो हो करके हंसे लागल लोग.
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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,

पो. झरिया, जिला-धनबाद, झारखंड(भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244

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