संपादकीय

दूध पियवलीं सांप के

भोला प्रसाद ‘आग्नेय’ जी जिनगी कऽ गहिराह बात अपनी छोटी-छोटी बात के कहत बानी अपनी एह गज़ल में। जिनगी में जेवन लउके ला ऊ होला ना औरी जेवन लउके ला ओकरी उल्टा औरी बिरोध में जाने का-का खड़ा हो जाला औरी मोका देखि के घात करेला। कुछ इहे बात आग्नेय जी कहत बानी अपनी एह गज़ल में। गज़ल बढिया बन परल बे भाखा बहुते आसान बा जेवन एके पढे लायक बनावत बे लेकिन गज़ल के बहर औरी बजन के खियाल रखे के फेरा में कबी भोजपुरी छोड़ हिन्दी के सबदनो के परियोग कइले बाड़ें। कुल्ह मिला के एगो बढ़िया गज़ल बे।


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दूध पियवलीं सांप के।
लाते मारलीं बाप के॥

अब त फुफकारे लागल
कमजोरी के भांप के॥

जब-जब पावेला मोका
कसे शिकंजा चांप के॥

बजावे बंशी चैन के
गाभी बोले टाप के॥

हमरे के मड़े लागल
चाबा-चाबा के नाप के॥

हमके उपदेस देबे
काम करे कुल पाप के॥

करेला अरथ के अनरथ
हमरे वार्तालाप के॥

सुर-ताल करे बेसुरा
झाल-मजीरा धाप के॥

दुनिया के सोझा कब ले
राखें आग्नेय ढांप के॥
अंक - 36 (14 जुलाई 2015)
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