विविध

भरसटाचार - प्रभुनाथ उपाध्याय

कइसे खतम होई देशवा से भरसटाचार
खतम होई कइसे सुविधा सुलूक आचार॥

सब लोग कहत बाड़े मुहँवा से उपर
नाही परियास पर हिरदय के भीतर।
माई खाती करीहें जे सब परोपकार
देशवा के हो जाईत बाड़ा उपकार।
कइसे खतम होई देशवा से भरसटाचार॥

छेत्र में करत जा मेहनत से काम
नवजवानन के मिलीहें ढ़ेर इनाम।
अइसन होई जे तऽ आई शिष्टाचार
दिल में केहू के नाही रही दूरविचार।
कइसे खतम होई देशवा से भरसटाचार॥

सब लोग पर बड़ा बोझ भइल बा
जहाँ जे बाटे तहाँ बेसुध भइल बा।
छेत्रबाद जातिबाद के भइल बा परचार
एकता के राग अलापे के बा बारम्बार।
कइसे खतम होई देशवा से भरसटाचार॥

---------------------प्रभुनाथ उपाध्याय


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