संपादकीय

संतोष पटेल जी कऽ पांच गो कबिता

रऊआँ सभ के सोझा श्री संतोष पटेल जी के पाँच गो कबिता जेवन जिनगी के ऊ बातन के बारे में बतियावट बाड़ी सऽ जेवन हमेसा भाग दौड़ में भुला-लुका जाली सऽ। चाहे बात 'पड़ोसी' कऽ होखे चाहे 'हंसी'। संतोष जी एह चीझन के अपनी कबिता में बहुत बरिआर ढँग से धईले बानी। रऊआँ सभ खाती ई सभ कबिता।
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झुग्गी-झोपड़ी

महानगर के शोभा
झुग्गी-झोपड़ी
एगो प्रश्नचिन्ह?
भा विकास के चेहरा पर
एगो चिंता के लकीर
खाली अख़बार के
पढ़ेवाला करेला फिकिर
धनिक लोग के इहाँ
नइखे कोनो जिकिर
धन के धाह से तपत लोग
चानी लेखा चमकत आँखि
सोना के खनखनाहत से गुंजत कान
आ अय्याशी से भरल
तन मन परान
एकरो चाहीं
पैर दबाये वाला / पोंछा मारे वाली
बर्तन मांजे वाली
जूठ काठ उठाये वाला
आ हवस के ठंडा
करे के साधन
रोपया के बल पर
छल पर
त फेर काहे न रही झुग्गी
आखिर बड़का होक के एहसास
इहे त करावे ला
महल के रूतबा बढ़ावे ला
याचक ना रहे त
दानी कौन ?
हँसेला महल
आ झोपड़ी बा मौन
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गरमी

गरमी बेसरमी ह
निदरदी ह
सुखा देला / ताल तलैया के पानी
हरियाली के निसानी
फुलवान के जवानी
बादल के कहानी / चोरा ले ला / कहीं ना
लउके ला तरान / फक फक परान / बून बून
पानी ला लोग हरान / परसान
गरमी पईसा के कठोर ह / टांगी नियर
गुमानी से उपजल गरमी / बड़ा कटीला ह
शुरू में ना बुझाला / ना पिराला
पोठइला पर दोसरा के संगे
अपने के जरा लेला
अपने के हरा लेला
बाकिर बुझाला ना / काहे कि
गरमी के चश्मा से कुछुउ / सुझाला ना
गरमी जवानियों में ह
उफ़नाला दूध नियर त
हलचल मचा देला
भाई बाबु के मरजी बिना
घरवा बसा लेला / नतीजा
जिनिगी नरक हो जाला
ना एनही के होला / न ओनही के
जईसे धोबी के कुत्ता ...
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पडोसी

दुःख: के दरियाव में / जे बनत रहे
पतवार / खेवनिहार
आजू का भइल ओह बेवहार में
बुझाते नइखे / हमार पडोसी
अब चिन्हाते नइखे
लागत बा / ओकरो हवा लागल बा
गुमान के
ना काका कहेला / ना भईया
दिनभर गीनत रहे ला रोपईया
चुपचाप / आवेला / चुपचाप जाला
केवाड़ी ओठंगा के खाला
कमरी ओढ़ के घी पियेला
अपने में मरेला / अपने में जिएला
उ जे कबो बिना नून मरीचा मंगले
ना खात रहे / ना तियाना तरकारी
पहुचावे में लजाये / आधा अपने खाए
हमरो के आधा खिआवे
आज बोलते नईखे
मुंह खोलते नईखे
हमार पडोसी
नेह सनेह के दुआर पर / परहेज के
ईटा धरि दिहले बा / ना ताकेला
ना झाकेला / हमार फिकिर बईठल 
बा
ओकर भाव चढ़ल बा
लागत बा पडोसी के परिभाषा बदल जाई
विश्वास के देवाल ढह जाई
नेह के डेहरी भहर जाई
टूट जाई परेम के डोरी
त का ! शब्दकोष से पडोसी
शब्द ओरा जाई ?
के रही दुख: में
धरनीहार
सुनानिहार
हे भगवान !
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हँसी

हँसल नीक ह / दवाई ह
ना जानी जे / केतना बेमारी
हंसले से ठीक हो जाला
जैसे सुरुज के हंसले
भाग जाला अंधरिया
चनरमा के हंसले फइल जाला
अंजोरिया
तना जाला
रेशमी चादर / चांदनी के
धरती के साथ पर / असही
हमरा गाँव में हँसी के बड़ा मोल बा
भईया के बिआह में
भतीजा के छट्ठीहार में
होली के महिना में
पीपल के निचे
चबूतरा पर
जब हँसी के फुहार छुटेला
त टूट जाला रसरी
मइल मन के
झर जाला काई
पुरान दुशमनी के
बाकिर शहरिया हँसी
जहरीला ह
लोग एक दोसरा पर हँसेले
ईर्ष्या में धंसेले
ओह बेरा त अउर
जब पडोसी कवनो दुःख में फंसेले
हंसियो के अजबे रूप बा
खने में नीमन / खने में कुरूप बा
बेसी हंसला पर गोली चलेला
बाकिर शहरे में
जहवा हँसल जला कम
हँसी उडावल जाला जड़े
गरीब पर / गरीबी पर
ईमानदार पर / सोझिया पर
तब
हमार मन कहेला
अच्छा बानी गांवे में
पीपर के छावें में
जहवा किरिनिया के हँसी में
बिहँसेला हमार चारू पहर .....
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चंदा

चंदा/ चंदा/चंदा
कवनो लइकी के नाम ह चंदा / त
कबहीं आकाश के पिंड ह चंदा/
बाकिर आज चंदा के ई दुनु अरथ/
बदल गइल बा
अब चंदा के पर्यायवाची हो गइल बा/
रंगदारी / जे देता उहो पछताता
जे न दे उहो पछताय
अजब आदमी के हाल बा /
छने छने बेहाल बा
पीपर के घंटा नियर टंगाइल बा
न एन्हरे डोल ता / न ओन्हरे
टुकुर टुकुर ताकत छोड़ के का करस ?
कहाँ जास उ / बुझाते नइखे
सुझाते नइखे / चंदा अंजोर
के बदले में अंधार बांटी
ई कही नइखे लिखल / बाकिर
आजू लिखाता / बिना मंगले
मिलत बा/ अन्हार/ हरानी परसानी
काहे के आजू के चंदा / अंजोर वाला
ना ह / अमावास ह / ई चंदा
चोरावत बा / आदमी के मुंह से हंसी
हरियाली.

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लेखक़ परिचय:-


पिता: डॉ गोरख प्रसाद मस्तना 

माता: श्री मती चिंता देवी

जन्म: 4 मार्च, 1974, बेतिया, पश्चिम चंपारण, बिहार 

शिक्षा: रिसर्च स्कॉलर (भोजपुरी) विषय " भोजपुरी साहित्य के विकास में चंपारण के योगदान", 
एम ए (त्रय) (इंग्लिश, हिंदी भोजपुरी), एम फिल (इंग्लिश)
स्नातकोतर डिप्लोमा (अनुवाद, पत्रकारिता व जनसंच्रार), सिनिअर डिप्लोमा (गायन)
सम्प्रति: संपादक - भोजपुरी ज़िन्दगी, सह संपादक - पुर्वान्कूर, (हिंदी - भोजपुरी ), साहित्यिक संपादक - डिफेंडर (हिंदी- इंग्लिश- हिंदी), रियल वाच ( हिंदी), उपासना समय (हिंदी), 

भोजपुरी कविताएँ एम ए (भोजपुरी पाठ्यक्रम, जे पी विश्वविद्यालय ) में चयनित " भोजपुरी गद्य-पद्य संग्रह-संपादन - प्रो शत्रुघ्न कुमार 

सदस्य : भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स निर्माण समिति, इग्नू, दिल्ली 

सदस्य: आयोंजन समिति - विश्व भोजपुरी सम्मलेन, दिल्ली, महासचिव - पूर्वांचल एकता मंच,
राष्ट्रीय संयोजक - इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद् 
महासचिव - अखिल भारतीय भोजपुरी लेखक संघ, दिल्ली 
प्रचार मंत्री - अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन, पटना 
प्रकाशन: भोर भिनुसार (भोजपुरी काव्य संग्रह), शब्दों के छांह में (हिंदी काव्य संग्रह), Bhojpuri Dalit Literature- Problem in Historiography
प्रकाश्य: भोजपुरी आन्दोलन के विविध आयाम, भोजपुरी का संतमत- सरभंग सम्प्रदाय, Problem in translating Tagore's novel - The Home and The World, अदहन (भोजपुरी के नयी कविता)

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