संपादकीय

किसान-व्यथा - मुकुन्द मणि मिश्रा

ऊँख के बोके दुख भइल बा ।
मिलत ना पइसा हूक भइल बा।
रुठ गइल का किस्मत खुद से ?
या हमनी से चूक भइल बा !!
दिल्ली-पटना मूक भइल बा ।
गेंहूँ -मसूरी सूख गइल बा।
काथी भरिहें डेहरी कोठिला !
पेटे जब दू जून भइल बा !!
मिलहन के दिल निलहन खानी।
कोठी-बंगला बोली -बानी ।
दिन उतरले मारल- फिरत ।
करजा-पइचा साव-दूकानी ।।
नाम परल बा अन्न के दाता !
कइसन बा ई व्यंग्य विधाता!
दर -दर भटके पिरे किसान !
दिने में ही रात बुझाता !!
पेट बाँध के पीअ गम !
तहरा खातिर सभे जम !
दम साध के देख लीला !
सबका मुँहे लागल रम!!
हे मुकुन्द !ई अंत कहाँ बा ?
ई किसान एकमत कहाँ बा?
मत एक जब पंथ ना होई ।
बाचत तबले पत कहाँ बा ??
------------------------------मुकुन्द मणि मिश्रा

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