संपादकीय

अंक - 25 (28 अप्रैल 2015)

आधुनिकीकरन औरी भूमंडलीकरन के जुग में हर चीझ आपन रंग-ढंग बदल ले बे। देस, समाज औरी आदमी, सभकर प्राथमिकता, नीति औरी मूल्य; सगरी चीझ बदल गईल बा। ई सभ चीझ एक सङगे मिलि के सभ चीझन के मतलब औरी महता भी बदल देले बाड़ी सऽ। 
कहल जाला कि ई देस किसानन के देस हऽ औरी किसानी सभ से पुरान कामन में से एगो काम हऽ। कबो किसानन के सहारे सगरी देस दुनिया कऽ राज-काज चले औरी किसानी दुनिया के सभ से बरिआर औरी महता वाला काम रहे। लेकिन घड़ी के काँटा घूमल औरी सभ कुछ बदल गईल। विज्ञान औरी मशीनन के खोज औद्योगीकरन के बढवलस औरी समय के संगे उद्योग-धन्धा रोजगार देबे वाला सभ से बरिआर औरी महता वाला खेवनिहार हो गईल। काहाँ कबो सगरी के सगरी लोग किसानी से जियत-खात रहलें तऽ आज किसानी देस के अधवो लोगन के रोजी-रोटी देबे के हालत में नईखे औरी जे किसानी में लागल ओकर जिनगी नरक नियर हो गईल बे। 
खेती कबो मुनाफा कमा देत रहल लेकिन विज्ञान औरी मशीनन के विकास के सङगे खेती ढंग-ढेवार एकदमे बदल गईल। कुछ साल पहिले ले खेती-बारी के काम में लागल किसान औरी मजूर के केहू के मूँह देखे के जरुरत ना रहे। ऊ अपना जरुरत के सगरी साज-सामान अपनी खेती औरी बारी सङेह लेव। लेकिन हरित क्रान्ति हाथ गोड़ थमले रासायनिक खाद औरी मशीन खेत में घुस गईली सऽ औरी किसान के दुर्दशा के दिन शुरू भईल। मशीन औरी खाद के खेती में परियोग से उपज तऽ बढल लेकिन खपत खाती सही बाज़ार ना मिलल औरी ए कारन आमदनी ना बढ पावल। जबकि लागत आमदनी से बेसी बढि गईल। औरी ए तरे किसान धीरे-धीरे गरीब औरी कमजोर होत गईल औरी नऊबत ऊ आ गईल कि अन्नदाता कहावे वाला किसान करजा में दबा के खईला बेगर मरे लागल। फेर सिलसिला शुरु भईल किसान के आत्महत्या के। 
ए देस में हर साल कई हजार किसान आत्महत्या करे लें लेकिन सरकारी अमला पर ए बात के केवनो असर नईखे। ओकरो ले बड़हन बात ई बा कि समाज के ए बात के केवनो चिन्ता फिकिर नईखे। औरी जहाँ तक रहल बात राजनीतिक दलन के तऽ दलन खाती हर बात खाली वोट से शुरु होला औरी ओही पर आ के शुरु हो जाला। अबे कुछ दिन पहिले दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर जेङने एगो किसान आत्महत्या कईलस औरी ओके ले के जेवन राजनीति शुरु भईल ऊ बहुते लाज लागे वाला बात रहे लेकिन सभ ओकर थपरी पीट के मजा लेत नज़र आईल। औरी दिल्ली के मुख्यमंत्री के संवेदनहीनता सगरी मानवता के नज़र झुका दिहलस जेकरा खाती रैली जरुरी रहे, केहू जान ना। 
जरूरी बा कि सरकार औरी समाज दूनो किसानन के हाल ले के कुछ अईसन काज करो कि ई अन्नदाता ना खाली दोसरा के खिया के खाली पेट मरे बल्कि खुदो खाये औरी खुश रहे ना तऽ आनाज सपना हो जाई।
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बीतल शनिचर के नेपाल औरी भारत में धरती डोलला हऽ औरी दूनू देसन में हजारन लोग के जान गईल हऽ। बहुत दुख के विषय बा ई। लेकिन सङही एगो चेतावनी बा कि समय आ गईल बा कि विकास के जेवन रंग-ढंग अपनावल गईल बा ओकरी के ले के बिचार होखे औरी विकास के अंहवट उतार के साँच के सामना कईल जाओ। विकास के केवनो एगो ढंग नईखे। केवनो समाज के विकास देस, काल औरि परिस्थिति के अनुसार होला ना कि कहल सुनावल बात से।
सहायक सम्पादक

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संत धरनीदास जी के पैदाइस ले के केवनो एगो मत नईखे औरी नाही केवनो बरिआर साक्ष्य बा जेवना के आधार पर उहाँ के जनम तिथी के केवनो जानकारी मिल सके। कहला जाला कि उहाँ के साठ साल ले जियनी। कुछ लोगन औरी परमाणन के आधार पर उहाँ के जनम सन विक्रमी संवत 1673 (सन 1616 ई) मानल जाला। ओही अ ङने उहाँ के मरन (स्वर्गवास) के तिथी विक्रमी संवत 1731 (सन 1674 ई) मानल जाला।

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पिय बड़ सुन्दर सखि
पिय बड़ सुन्दर सखि बनि गैला सहज सनेह ।। टेक।।

जे जे सुन्दरी देखन आवै, ताकर हरि ले ज्ञान।
तीन भुवन कै रूप तुलै नहिं, कैसे के करउँ बखान ।। 1।।

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चढ़त उमिरिया देहियाँ अस चिकनाय - हरिराम द्विवेदी
चढ़त उमिरिया देहियाँ अस चिकनाय,
टपरै नाहिं पुतरिया मन बिछलाय
बड़हनि अँखिया पातर काजर-रेख,
पिछउँड़ होइ अनियासै देहलिन देख
चितवनियाँ कुछ अइसन गइल सहेज
पानी-पानी भइलैं काठ-करेज
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बचपन के खेलवा छिनाय गइल मीतवा।
माटी के गीतवा भुलाय गइल मीतवा।।

ओका- बोका तीन तड़ोका 
लौआ लाठी चंदन काठी
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