संपादकीय

अंक - 16 (24 फरवरी 2015)

आज मैना कऽ सोरहवाँ अंक रऊआँ सभ के सोझा पेस करत बढिया लागत बा। ए अंक में चार गो रचना बाड़ी सऽ। जेवना में दू गो कबिता, एगो लेख औरी एगो संस्मरण बा। ई अंक रऊआँ सभ खाती।
- प्रभुनाथ उपाध्याय

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आजू हमनी के देश में भोजपुरी बोलेवाल के संखेया कम नईखे. बहुत ही आसान आ हिंदी से मिलत जुलत मीठा भाषा बा. जेकरा चलते एह भाषा के दोसर भाषावाले लोगो आसानी से समझ जलऽन. बाकी आजू नचनिया बजनिया आ माईक चबा जाए वाला लोग भोजपुरी के हंसबरवाह बनऽल अपना वासना के टूड गडा रहल बाडन . एकरा पीछे कही ना कही हमनी के जिम्मेवार बानी जा.

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हमरा गाँव के बरम बाबा खाली पीपर के पेड़े ना रहले, आस्था के ठाँव रहले, श्रद्धा के भाव रहले. सामाजिक, पारिवारिक आ ग्रामीण जीवन-शैली के मिलन के छाँव रहले. समूचे टोला के पहचान रहले. मौसम कइसनको होखे, ऊ त एगो तपसी जस अपना तप से सबके सुख चाहें. जेठ के ताप में भी ऊ अपना नवका पतई से सबके तन शीतल आ मन शांत करे वाला बेना रहले. ऊ एगो जड़ (पीपल) हो के चेतन स्वरूप में सगरो गुड़ के भंडार 

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मंदिर में मंथन भइल, मिली जाम मुक्ति?
जाम-झाम की नाम पर, आपन-आपन युक्ति।।
नगर निगम में धांधली, गेट में ताला बंद।
लाठी चार्ज में बहल लहू,ऊपर से शांतिभंग।।
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भोजपुरिया जवान नाही सहेला गुमान, 
इ बतीया कऽ फइला द हर गली जवार, 
देखत रह जाई इ पुरा संसार, 
मिटा द हिन्दुस्तान से दुश्मनी के नावो निशान, 
तबे कहइब तु खाटी भोजपुरीया जवान। 
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