संपादकीय

लिट्टी - केशव मोहन पाण्डेय

केशव मोहन पाण्डेय जी के काथा कहे के ढ़ंग, सबद औरी भाव भोजपुरिया समाज के उह ढ़ंग औरी मन देखावत बा जेवना के संगे ऊ जाने कबसे जीयतरें औरी ओके समझे खाती भाखा के गियान काफी नईखे। ओकरा खाती भोजपुरी जिए परी ओ समाज में रमे परी। लिट्टी केशव जी ओही ढ़ंग के कहानी बे रउओं सब एकेर रस लीं
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चार-पाँच दिन से रोज गदबेरे कुक्कुर रोअत रहलें स. बुझात रहल कि ए गाँव में जरूर कुछ बाउर होई. सावन के मेघो तनी देर पहिलहीं दू दिन बाद साँस लेहले हवें. ऊँचास के पानी खलार में बह गइल बा. आ ओह राह में कहीं-कहीं, तनी-तनी रुकलो बा. अदितमल अबो बरसाती ठण्डा के मारे मेह के चादर ओढ़ले बाड़े, बाकिर उजास बाऽ. गाछन से अबो बुन्नी टपर-टपर टपकऽता आ चिरइयन के ऊ बिलायती भाषा चारु ओर सुनाता. चिरइन के साथे फतिंगो आकाश के सिंगार करत बाड़ें. लागऽता कि अदितमल के गुदगुदा के उनकर चादर हटावल चाहत बाड़े. दुआरी पर बरम बाबा के मोटका गाछ बा. ओहू से पानी टपकऽता, ओरीओ से टपकऽता, फूलो से टपकऽता. दूभो पानी में कवनो गोर-पातर लइकनी नियर नहाइल बिआ. बरम बाबा के सगरो गाछ नइखे भींजल त बुझाता कि केहू सुतला में उनका मुड़ी पर एक कचोरा पानी गिरा देहले बा. अब लोग घर में से बाहर निकलऽता. जलेसरो बाबा अपना ललकी गइया के पगहा थमले निकललन. ए बेरा ऊ गोड़ में खड़ाऊँ, कमर में नील लागल उजर धक-धक धोती, आ ऊपर दरजी के सिअल बंडी पहिनले बाड़े. बंडी के कपड़ा अइसन कि ओकरा नीचे के मोटका जनेवो लऊकता. जलेसर बाबा मास्टरी से पेंशन पावेलन. देंहि से मोट-झोंट आ रंग-रूप से गोर भभूका बाड़ें. मोंछ आ मुड़ी के बार हिमालय के निट्ठा बरफ लागता.
नाद के खूँटा में गइया के बान्हते कहलन, – ‘ए दीपेन्दर! छाँटी लेआ के नाद बोझ दऽ. कई दिन से इनकरो पेट नइखे भरल.’
दीपेन्दर छाँटी ले के निकलले कि उनकर गोड़ बिछलाइल. उ तऽ चालाकी कइले कि टाट पर हाथ मरले, ना त मुँहे बाऽ देते. अब अदितोमल हँसते आपन चादर हटवलन.
कवन समइयो भइल रहे. सबेरे के नौ बजत होई. उत्तर से दिनेसवा झड़कल आइल,-‘पंडी जी! …. काली के गिरोह आवऽता.’ कहि के चलि गइल.
डरे दीपेन्दर के आँख भंटा आ मुँह टमाटर हो गइल. कहलें,-‘बाबूजी! हाली से भीतरी आ जाईं.’
‘अरे घर घूसर! …. ऊ का करी हो? …. ऊहो त एही गाँव के हवे. जा-जा नाद बोझऽ.’- जलेसर बाबा डपटलन.
अपना पाँच सवाँगन के साथे काली अइले. कालीओ एही गाँव के लइका हवें. एही माटी के दूध से उनकर खून बनल, बाकिर एही महतारी के उ झोंटा उखाड़ेलन. अब ऊ एगो भयंकर डाकू बन गइल बाड़े. लाल देहिं, बड़े-बड़े मोंछ आ लाल-लाल आँख. कुर्ता-लुंगी आ हवाई चप्पल पहिनले बाड़े. कंधा पर बन्दूक आ कमर में गोली के बेलट. आवते जलेसर बाबा के दण्डवत कइले. लगले दीपेन्दरो के. उनका पाछे सभे उहे कइल. काली अपना मोंछ पर हाथ फेरत पूछलन, – ‘का हो दीपेन्दर भाई! अभीन सरसतीए जी के साथ बा? . . . . बाबा बुढ़इनी, अब लछमीओ माई के पूजा करऽ.’
‘इनहूँ के बन्दूके चाहीं काली. हार मान लेहले हवें.’ – जलेसर बाबा कहलन.
मन में पइसल अपना भय के भगावत दीपेन्दरो कहलन, – ‘अब बाबा लोगन से सरकार के विराग हो गइल बा. नोकरी-वोकरी खाली छोटकने क घरे जा ता.’
तलेक बीचे में जलेसर बाबा टोक पड़लन, – ‘ऊ सब छोड़ऽ, पहिले ई बतावऽ कि कहाँ के चढ़ाई बा?’
‘हमनी के एगारे आदमी बानी जा. आज अपना घरे हमनी खातिर खाना बनवा दीं.’ – काली कहलन.
बहुरिया भीतरे से टाट फाड़ के देखत रहली. दीपेन्दर के ई भइबे ना करेला. जलेसरो बाबा नाक सिकोड़लन – ‘तऽ खनवा बनाई केऽ?’
‘राउर पतोह लोग नइखे?’ – काली पूछलन त बाबा के ई लागल कि ना कह देहला से ई बलाय टल जाई.
साँच से साँच आदमीओ झूठ बोल के बलाय से दूर होखे के चाहेला. कहलन, – ‘ना, केहू नइखे.’ तब्बे भीतरी से कवनो बरतन के लड़ला के आवाज भइल. कालीओ के लाग गइल कि इ झूठ बोलले बाड़े. उहो मने मन दोसर मन बना लिहलें. अपना मोंछ के ठीक करते कहलन, – ‘त आटा होई नऽ, …. दींऽ. ….हमार आदमी लिट्टीए लगा लीहें.’
जलेसर बाबा अपना के मकड़ा के जाल में फंसत पवलन. का करें! काली के डर से सगरो गाँव खाली होत जाता. जेही से सुनऽ उहे गाँव से भाग के शहर में जमीन ले लीहल. रोज सुने के मिलेला, – जान रही त जहान रहीऽ. – बाबा त एगो साधारण आदमी हवें. ऊ एह धरती के पूजा करेलन. जवना धरती पर जनमले, ऊ इनकर माई ह़ऽ, आ माई के छोड़ल एगो बेटा खातिर सबसे बड़का पाप ह.
बाबा के पाँच पूत बाड़ें. बाबा आपन पानी बचावे खातीर शहर में जमीन खरीद के घर बनवा के बहुरिया लोगन के भेज देहलन. जलेसर बाबा माया जाल में रहिओ के एगो संन्यासी हवें. चरित्र अइसन कि ठाँवे ठाँव सीख मिलेला. मनबढ़ुई कबो ना भावेला बाकिर धरती माई के बचावे खातिर मन मार लेहलन. दीपेन्दर से कहलन, – ‘जा के हँड़िआ में से आटा लेआऽ द.’
दीपेन्दर घर में पइसते काँपे लगलन. लागल कि कवनो सोखा उनका पर भूत खेलावता. उनकर मलिकाइन झकझोरली,- ‘ई का हऽ जी? …. मरद हो के डेराऽ तानी?…. आरे जब मरहीं के होई तब केहू रोक पाई काऽ?’ – आवाज मधीम रहे बाकिर साँस आ मुँह के हवा तेज रहे. दीपेन्दरो ओही तरे कहलन, – ‘डर त बाबूजी के झूठ बोलला से बा. तूँ घरही में बाड़ू आ……..’
‘का भइल हो?’ – दुआरे से बाबा के आवाज आइल.
दीपेन्दर झड़कले हँड़िया लेहले आ गइलन. अब तनी उनहूँ के ताव आ गइल रहे. कहलें – ‘आटा त बा, बाकिर ई अपना मेहनत से काहे ना उगावेलऽ काली? …लोग डेराऽता, तबो तहरा खनगर खाना नइखे मिलत. लिट्टी-उट्टी कवनो खाना हऽ?’
‘हम उगाईं चाहे तूँ, बात त एके भइल. बरम बाबा सबके सब गुन थोड़े देलनऽ.’
जलेसर बाबा के ना खेपाइल. कहलन, – ‘त एगो बात सुनऽ काली. …. एह बेरा त लिट्टी खाऽ, बाकी आजु के बाद एक्को चिटुकी आटा ना मिली. हम दोसरा खातिर ना मेहनत करीले.’
काली आपन आँख तरेरलन, – ‘ई त हमार हक हऽ बाबा. जे हमरा के खाना ना दी, उ हमार गोली खाई. …. एह गाँव में रहला के ओके अधिकार नइखे.’
जलेसर बाबा के मन में दबल साहस जाग गइल. कहलन,- ‘तूँ निकलबऽ एह गाँव से? …. ई गाँव हमार महतारी हऽ महतारी. …. महतारी से बेटा के अलग करबऽ? …. ई पाप ह पाप!’
‘राउरो घरी पेर लेहले बा बाबा. …. आज के रात काली खातिर रउरा नामें. पहिले लिट्टी खाए दीं.’
‘जा-जा. हम ढ़ेर बानर के दाँत देखले बानी.’
बाबा के ई बात पर काली के आदमीअन के तनी ताव आइल, बाकिर ऊ मना कइलन.
काली के गइलो पर जलेसर बाबा के खीस सेराइल ना रहे. खीस के राहे मन के कवनो कोना में काली के भयो खेलत रहल. बाकिर ऊँहा के मन में माटी के रक्षा खातिर उत्साहो रहे. बाबा के चिन्तो हो गइल. …. जेकरा खातिर आँख में चिन्ता समा जाला, उहे महतारी हऽ. …. ई माटी अपने नाहीं, बाबा के पितरो के महतारी हऽ.
बदरी बुनिआए लागल. जलेसर बाबा आ दीपेन्दर भीतरी आ गइलन. दीपेन्दर कहलन, – ‘हम त कहेब कि ई माया-मोह छोड़ के रउरों शहरीए चलि चलीं. ई सब राकस हवें. ई पेटो भरला पर खालें आ भूखो लगला पर.’
बाबा के ई बतिए ना भावेला. कहलन, – ‘तहरा डर होखे त जा. ओकरा डरे हम आपन माटी छोड़ के परदेसी हो जाईं?’
भय त सगरो घर में पइसल रहे. आजु ना केहू बाजारे गइल, ना खेते. डेराते-डेरात साँझ आपन झोंटा छितारे लागल. एह बेरा पछिम में किरीन तनी हँसत रहे बाकी टहटहाइल ना रहे. सँझवत होते खाना तइयार हो गइल. अन्हरिया झोहे लागल. बदरी से तनीए देर बाद रात अमावसा क लखां लागे लागल. दीपेन्दर सिरहाने टांगी रखले, बहुरिया पँहसूल, आ बाबा छूरा. जानकारी भइला पर सभे बिपत से लड़े के चाहेला. ….गाँव में एगो-दूगो जे घर रहे, से सभे जल्दिए सूति गइल. एन्ने ना बहुरिए के पलक झपकल, ना दीपेन्दरे के. जलेसर बाबा त बड़ेरी के बतीए गिनत रहि गइले. दियरखा पर ढेबरी टिमटिमात रहे. बरम बाबा के गाछ पर भकजोन्ही उड़त रहली आ अँजोर करत रहली. लागत रहे कि उनहूँ के नींद परा गइल बा. अब झींगुरन के बाजा बन्द हो गइल रहल. नदी किनारे से कबो-कबो चकवा के बोलावल सुनात रहे त कबो-कबो ऊखि के खेत से सियारन के हूँआ-हूँआ. घर में अनाजन के बोरा पर शायद बिलार मुस के दबोचलस. जलेसर बाबा चिहुकलन बाकिर दीपेन्दर चाहे बहुरिया जाने ना, से सुगबुगाइए के रहि गइले. तनी देर बाद ऊ दूनो जने के त नींद आ गइल, बाकिर बाबा के आँख पानी के मछरी जइसे चमकते रहल. अंगना में तुलसी जी के ठाँवे संझा के दीया जरत-जरत जुड़ाए पर आ गइल रहे. एकाएक कुक्कुरन के भोंकल सुनाइल. लागल कि केहू आवता. बाबा के डर आ बेचैनी बढ़ गइल. ओठँगले केवाड़ी के ओट से देखलन त उ साँढ़ देखले रहलें कुल. बिछवना पर उल्ह-मेल्ह करते कबो नींद आ गइल बाकिर केंवाड़ी के किल्ली ना लागल रहे. कुक्कुर-बिलार के डरे कम बाकिर चोरन के डरे ढ़ेर, लोग खरो के घर में केंवाड़ी लगावेला.
नींद में त आदमी दोसरा दुनिया में घूमेला. बुझाला कि सचहूँ ई संसार माया मोह हऽ. सबसे अलगे, अपनो से बेचिन्हल हो के आदमी पड़ जाला. ना कवनो चिन्ता-फिकिर रहेला, ना कवनो खोज-खबर.
धड़ाक् से केवाड़ी खुलल. जलेसर बाबा चउक के बइठ गइलन. काली अपना सँवागन के साथे जुमि गइल रहलन. एगो गमछी में ढ़ेर लिट्टी गँठियावल रहे. ओके खोल के जलेसर बाबा के देहिं पर फेंकते कहलन, – ‘का रे बभना!…. तोरा बाप के ई गाँव हऽ? ….ई माटी तोर माई हऽ? ….एसे अन्न उगावेलीस? ….ले अपना आटा के लिट्टी. ….खो, आ चल, अबे उठ… आ भाग एह गाँव से.’
जलेसर बाबा बुझि गइलन कि ई बड़का आफत आ गइल बा. काली के बात के जवाब देबे से पहिले चिलइलन,- ‘ऐ दीपेन्दर! ….तहरा के हमार कीरीया. …. तहरा मुअला महतारी के कीरीया. …. बहुरिया के ले के भाग जा घर से.’
तबले दीपेन्दरो जाग गइल रहलन. अपना बाबूजी के बात सुनि के परइलन. काली एगो लिट्टी लेके जलेसर बाबा के मुँहे में डाले के चहलन, बाकिर ऊ पाछे हट के रोसइलें, – ‘ई का काली? …. अनाज देहला के इहे ईनाम हऽ? ….लोग त अपना खून से नून के दाम चुकावेला. ….हे राम! ई जमाना कहाँ आ गइल? ….सभे अदब भुला गइलऽ.’
काली पर भूत सवार रहल. लिट्टी जलेसर बाबा के नकलोले पर जमावत कहलन,- ‘हाली से ई गाँव छोड़ऽतारे कि ना रे बभना?’
‘त सुऽन. ….तें कुछु करबे त का हऽ, …. हमार माटियो लागि जाई त का हऽ, ….मूँऽ जाएब बाकिर ई गाँव ना छोड़ब.’
जलेसर बाबा के एतना कहत कहीं कि लाठी आ बन्दूक के नाल लागल गिरे. बेचारु लइकन जइसे माई-बाप चिल्लाए लगलन. बाप के चीख सुनि के दीपेन्दरो के करेजा फाटे लागल. बहुरिया त डेरा के दीपेन्दर के भर अँकवार पकड़ लेहली. दीपेन्दर ‘दउरऽ लोगनी होऽ, ….डाका पड़ल बाऽऽ’ …. चिल्लाए लगलन.
….पुरुब से फरछीन होखे लागल. रात भर में बदरो बिला गइल रहल. काली अपना सँवागन क साथे परा गइलन. गनीमत रहे कि जलेसर बाबा के जान ना लेहलन. ….तले कई लोग आ गइल आ देखल कि खून से सनाइल बूढ़ऊ बेहोश छितराइल रहलन आ ओहिजा लिट्टीओ छितराइल रहे. पुरुब से सूरजो भगवान आँख खोले लगलन, बाकिर उनकरो मन मलुआइल रहे.
जलेसर बाबा के लाद के दीपेन्दर शहर ले अइलन. तीन दिन से अस्पताल में परल रहलन. देहिं पर घाव रहे बाकिर चेहरा पर एतना चोट खाईओ के परदेशी भइला से बँच गइला के गर्वो रहल. आजु सबेरहीं अखबार पढ़लन त आँख चमक गइल. ….काली के भूखला के घरे लिट्टी खात में पुलिस गोली मार देहलस. ….बाबा सुतले-सुतल एगो लमहर साँस लेहलें. ….आखिर ई माटी अपना अनाज के लिट्टी के दाम काली के जान से लेइले लिहलस.

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लेखक परिचय:- 

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन।
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख, दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित।
नाटक लेखन आ प्रस्तुति।
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण, टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन.
संपर्क
तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र.

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