विविध

अंक - 11 (20 जनवरी 2015)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के एगारहवाँ अंक परस्तुत बा। निक लागता कु्छ दूर तक आईल बानी जा। ए अंक में दू गो रचनाकारन भगवती प्रसाद द्विवेदी जी औरी केशव मोहन पाण्डेय जी के कहानी परस्तुत बाड़ी सऽ।
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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हरियर बांस के अरथी सजावल जा चुकल बा. चाची के मूवल देह में घीव लेपिके उन्हुका के अरथी प सुता दीहल गइल बा. चारों कोना प अगरबत्ती जरा दीहल गइल बाड़ी स. इतर फूलन से वातावरण गमगमा उठल रहे. हम चाची के अरथी के कान्हा देवे खातिर आगा बढ़त बानी. घरी घंट बाजे लागत बा आ 'राम नाम सत है' के सुर हवा में लहराए लागल बा. हमनी के गंगा घाट का ओर कुलांचत बढ़े लागल बानी जा. अंगना से आवत करुन आवाज गंवे-गंवे मद्धिम पड़त जा रहल बा.
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चार-पाँच दिन से रोज गदबेरे कुक्कुर रोअत रहलें स. बुझात रहल कि ए गाँव में जरूर कुछ बाउर होई. सावन के मेघो तनी देर पहिलहीं दू दिन बाद साँस लेहले हवें. ऊँचास के पानी खलार में बह गइल बा. आ ओह राह में कहीं-कहीं, तनी-तनी रुकलो बा. अदितमल अबो बरसाती ठण्डा के मारे मेह के चादर ओढ़ले बाड़े, बाकिर उजास बाऽ. गाछन से अबो बुन्नी टपर-टपर टपकऽता आ चिरइयन के ऊ बिलायती भाषा चारु ओर सुनाता. चिरइन के साथे फतिंगो आकाश के सिंगार करत बाड़ें. लागऽता कि अदितमल के गुदगुदा के उनकर चादर हटावल चाहत बाड़े. दुआरी पर बरम बाबा के मोटका गाछ बा. ओहू से पानी टपकऽता, ओरीओ से टपकऽता, फूलो से टपकऽता. दूभो पानी में कवनो गोर-पातर लइकनी नियर नहाइल बिआ. बरम बाबा के सगरो गाछ नइखे भींजल त बुझाता कि केहू सुतला में उनका मुड़ी पर एक कचोरा पानी गिरा देहले बा. अब लोग घर में से बाहर निकलऽता. जलेसरो बाबा अपना ललकी गइया के पगहा थमले निकललन.
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