संपादकीय

बाट जोहत - भगवती प्रसाद द्विवेदी

हरियर बांस के अरथी सजावल जा चुकल बा. चाची के मूवल देह में घीव लेपिके उन्हुका के अरथी प सुता दीहल गइल बा. चारों कोना प अगरबत्ती जरा दीहल गइल बाड़ी स. इतर फूलन से वातावरण गमगमा उठल रहे. हम चाची के अरथी के कान्हा देवे खातिर आगा बढ़त बानी. घरी घंट बाजे लागत बा आ 'राम नाम सत है' के सुर हवा में लहराए लागल बा. हमनी के गंगा घाट का ओर कुलांचत बढ़े लागल बानी जा. अंगना से आवत करुन आवाज गंवे-गंवे मद्धिम पड़त जा रहल बा.
हम आज आपन अहो भाग मानत बानीं जे चाचा के मयजल में शामिल भइल हमरा नसीब में रहल. एकरा के संजोगे कहल जाई कि हमरा टेलिफोन से सूचना समय से मिल गइल आ सरकारी नौकरी से छुट्टिïयो मिले में ढेर दिक्कत ना भइल. चाची के आखिरी चाह रहे कि उन्हुका मुंहे आगि हमहीं दिहीं. बाबूजी उनका से बेरि बेरि बाछी छूये खातिर निहोरा कइलन बाकिर ऊ टालत चल गइली. उनकर आंख त खाली हमरे बाट जोहत रहे. फेर हम भला कइसे ना अइतीं. हमरा प उनकर सांचो के नेह छोह जे रहे.'जापर जाकर सत्य सनेहू...'
टुकुर टुकुर छत का ओर ताकत चाची के आंखि, अचके हमरा प नजर पड़ते बुझाइल कि भावातिरेक में छलछला गइल होखे. फटाफट बाछी छुआवे के इंतजाम कइल गइल रहे. उहो हमार पीठ थपथपवले रही. जइसहीं कुछ कहे के गरज से उनकर जबान लडख़ड़ाइल, मुंह खुलल के खुलले रह गइल आ कोटर में धंसल आंखि एकाएक थिर हो गइली स.
परिवार में सभ केहू के आंखि सावन भादो लेखा झमाझम बरिसे लगली स. बाकिर हम त चाची के मुंहे का ओर चितवत रहि गइल रहनी. बुझात रहे, चाची अब असीसत गदगद कंठ से कह उठिहन कि जुग जुग जियऽ ए बचवा, कहऽ कब अइलऽ हा?
चाची के भतीजा होइयो के हम उनकर बेटा रहनीं आ हमरो खातिर ऊ चाची के जगहा माइये रहली. बस अपना कोखि से जनमवले भर ऊ ना रही. डेढ़े बरिस के उमिर में जब हमार महतारी एह निठुर दुनिया से कूच क गइल रही आ जब बाबूजी नया महतारी के ले आवे से इनकार कर देले रहन त चाचिये हमरा के पलले पोसले रहली आ ऊ सब कुछ देले रही जवन एगो महतारी आपन बेटा के देवेले. उनकर लाड़ प्यार आज ले भुला नइखी पाइल. बात बेबात हमार रिरियावल, रूसल-फूलल आ उनकर पुचुकारल-पोल्हावल. तबे नू हम उनका के चाची के जगह माइये कह के बोलावत रहीं.
बाकिर जब होश सम्हरनी त एक दिन कवनो संघतिया छेड़ले रहे 'ई त आपन लंगड़ी माई के बेटा हऽ!'
'धत ऊ हमार आपन मांई थोरहीं हई!' हम सफाई पेश कइले रहनीं, 'चाची हई चाची!'
तहिए से हम उनका के माई कहे में लजाए लगनीं आ चाची कह के बोलावे लगनीं. पहिला हाली एह संबोधन के इस्तेमाल करत तनी हकलाइलो रहनी. उहो हमरा के अचरज भरल निगाह से निहारे लागल रही. जनाइल जइसे भीतरे भीतर कुछो दरक गइल होखे. हमरा खातिर भलहीं ऊ अब माई के जगहा चाची हो गइल होखस बाकिर हम उनका खातिर अजुओ उनकर बेटा रहनी.
बुढ़ारी में चाची के हमार अबोध लरिका 'लंगड़ी दादी' कह के बोलावत रहलन स. कतना सहज रहे उनकर सुभाव. डेगे डेगे प समझौतावादी रवैया.
चाची जनमे से लंगड़ ना रही. उनकर लंगड़ाहट सामाजिक रूढि़ आ मान्यता के लंगड़ाहट रहे. गुड्डïा गुडिय़ा से खेले के उमिर में चाची के हाथ पीयर क के एगो पिंजड़ा में कैद क देल गइल रहे.चाचा तब ले परदेसी हो चुकल रहलन. ऊ कवनो मारवाड़ी किहां दरवानी करत रहन. बाकिर उनका टीबी हो गइल रहे आ गवना के पहिलहीं ऊ आंख मूद लेले रहन.ओह दिन महाशिव रात के तेवहार रहे आ चाची औघड़दानी के पूजा करे खातिर शिवाला के सीढ़ी दनादन चढ़त रही. ओही घरी केहू उनका के चाचा के मउअत के सूचना देलस. ओकरा बाद ऊ धड़ाम से गिर के बेहोश हो गइल रही. सीढ़ी से गिरत समय उनकर गोड़ के हड्डी टूट गइल रहे आ ऊ जिनगी भर खातिर लांगड़ हो गइल रही.
उनकर मांग के सेनुर के लकीर पोंछ दियाइल रहे. हाथ के चूड़ी चकनाचूर क दीहल गइली स. चाची पहिला हाली जब असवारी में बइठ के ससुरा अइली त एगो विधवा बन के. ऊ कबो सोहागरात ना देखले रही कि आखिर का होखेला सोहागरात.
होश सम्हरला के बाद जब आजी चाची के बारे में सब कुछ बतवली त हमरा बड़ा पीर भइल अगिला दिने चाची से एकन्ता में जाके हम चाची से पूछ बइठनी कि 'चाची ! नानाजी तहार बिआह दोसर जगह काहे ना क देले रहलन.?'चाची के आंख डबडबा आइल रहली स. ऊ आपन आंचर से आंखि नाकि पोंछ के कहली कि 'ई बात फेरू मत कहिहऽ. ई त जनम जनम के गठजोड़ ह. अइसन सोचलो प पाप लागी. अगिला जनम में तहरा चाचा से फेर भेंट होई ए बचवा. कुंवार बेवा के रूप में जिनगी काटत चाची बुझाला कि अगिला जनम के बाट जोहत होखस. आजु चाची के परान पखेरू चाचा से मिले खातिर उडि़ चलल होई. बाकिर चाचो का चाची के बाट जोहत होइहें? आ जदी ना तब? गंगाघाट प नजर धउरावत हमरा लाग एके साथे कई गो अरथी रखल गइल होखे. चाची के अरथी, दीपा भउजी के अरथी गंगा फु आ के अरथी. इहां से उहां तक अरथिए अरथी.
दीपा भउजी के शीतला माई के दागी वाली सांवरी सूरत आंखि के सामने नाचे लागल. इयाद के कड़ी अपने आप जुड़त जात बाड़ी स... 'बबुआ जी उनका नावे एगो पाती लिख देब?' दीपा भउजी घूंघ कढ़ले सवाल कइले रही.
जब हम किताब से निगाह उठवनीं त दीपा भउजी जइसे लाजे जमीन में गड़े लगली.
'काहे ना, ले आवऽ' हम उनका हाथ से लिफाफा लेत कहले रहीं. जब हम उनका से सुधाकर भइया के पता ठिकाना जानल चहनी त ऊ बस कलकत्ता बतवली. अब भला हम उनका के कइसे बतइतीं कि कलकत्ता में हजारो सुधाकर होइहन. आ डाकिया कवना सुधाकर के चिी थमाई?
सुधाकर भइया गवना करा के दीपा भउजी के घर में बइठा देले रहलन. खुद परदेश के रोटी कमाए निकललन त फेरू घर दुआर के कवनो खोजे खबर ना लिहलन. दीपा भउजी बस उनकर बाट जोहत रहली. मुंडेरा प जइसहीं कवनो काग बइठे कि भउजी ओकरा से पूछे खातिर अंगना में धउरल आवस कि काग भइया तनी उचारऽ ना, ऊ कब अइहें? कए तरह के लोभ प्रलोभनो प जब काग ना बोले त ऊ ओकरा ढेला से मार के भगा देस.
बूढ़ सास बस चौबिसो घंटा दीपा भउजीए के कोसत रही कि ई नागिन डाइन बन के हमार लाल के डस लेले होई. एकरे सब करतूत होई, ना त हमार सोना नियन बेटा आइत काहे ना. आ ओनिया दीपा भउजी के लोराइल आंख झमाझम बरसे लागत रही स.
कबो हाथ देखे वाला पंडा आवे त दीपा भउजी केवाड़ के आड़ में ठाढ़ होके हाथा देखावत पूछस कि बाबा तनी देखीं ना ऊ कब अइहें?
जदी पंडा भइया के जल्दी आवे के भविष्यबानी करस त हुलास से भर के भउजी सेर दू सेर अनाज ओकरा झोरी में डाल देत रही.
बाकिर सुधाकर भइया के ना त आवे के रहे आ ना ऊ अइले. दीपा भउजी मने मने गुनावन करे लगली कि- अइसन बुझाता कि जरूर कवनो बंगालिन उनका के भेड़ा बना के रख लेले बिया. लोग ठीके कहेला - पुरुब जन जइहऽ मोरे राजा...
बाद में पता चलल कि सुधाकर भइया सांचो ओहिजा जाके घर बसा लेले रहन. उनका दीपा भउजी के दागदार सूरत देखते हुल आवत रहे आ ऊ उहां जाके एगो गोर गार चिकन चाकन बंगाली छोरी के जाल में बढिय़ा से अझुरा गइल रहन.
एक बार हम दीपा भउजी के समझावे के भरसक प्रयास कइनी 'भउजी, तू सुधाकर भइया के दफ्तर में जाके शिकायत करऽ. उनका दू गो जिंदा मेहरारू रखे के कवनो हक नइखे.' बाकिर भउजी अनमनस्क भाव से कहस कि 'ना बबूआ जी ना, ऊ जहां रहस सुखी रहस. हमार सोहाग अमर रहो. अगर हमार सनेह सांच होई त उनका एक-ना-एक दिन इहां आवहीं के पड़ी.' हम दीपा भउजी के मुंह दने ताकते रह गइनी. उनकर लिलार आत्मविश्वास से चमचमात रहे. काश सुधाकर भइया दीपा भउजी के गंगाजल नियन मन के सुधड़ता के निरेख पवतन.
गंगा जल नियन त गंगो फुआ के मन पाक साफ रहे. जिनकर बिआह बड़ा धूमधाम से फौजी से भइल रहे जे साल दू साल में पनरह दिन खातिर आवे अउर जादे से जादे समय बहरिए बीतावे, कबो बधार में त कबो हीत नाता आ संघतियान के साथे.एने उनकर सास उनका के ओझा गुनी से देखावस कि लइका बा कि ना. एक दिन फूआ कह देली कि 'लइका का हाथ के लकीरे से जन्मी?' एह प सास उनका के उलाहना देस कि तें चुरइल हवे, तोरा कोख में कुछ हइये नइखे. बाद में उनका के हमेशा खातिर नइहरे भेज देल गइल. जहवां उनकर बाट जोहे के सिलसिला आजुओ जारी बा. उनका भरोसा बा कि एक ना एक दिन फूफा उनका के ले जाए खातिर अइहें.

चाची के अरथी उठा के चिता प सुता देल गइल बा. हम मुंह में आग देत बानीं. चिता धू धू क के जरे लागत बा. हमरा लागत बा कि जइसे खाली चाचिए ना बलुक दीपा भउजी आ गंगा फूआ के सतरंगा सपना जरत होखे. आस-हुलास आ दिली चाह राख होके माटी में मिलत होखे. अतना सांसत आफत झेलला के बाद घवाहिल मन से का अगिलो जनम में ऊ लोग आपन पति परमेश्वर के बाट जोही लोग?

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