संपादकीय

अंक - 5 (11 सितम्बर 2014)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के पाँचवा अंक परस्तुत करत निक लागत बा। नया-नया केवनो शुरूआत होला तऽ बड़ा नीक लागेला काँहे कि उम्मीद दिया बहुते जोर से जरे ला। पाँच महीना बीत गईल लेकिन कुछु अईसन ना भईल जेवना के ई कहल जा सको कि साहित्य खाती कुछू बढ़िया काम भईल बा। एहू अंक में खाली दू गो काब्य रचना बाड़ी सऽ। ए अंक में गोरख पाण्डेय जी कऽ 'सपना' औरी कबीरदास जी कऽ 'कौ ठगवा नगरिया लूटल हो' रचना रऊआँ सभ खाती। 
- प्रभुनाथ उपाध्याय 
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सूतन रहलीं सपन एक देखलीं 
सपन मनभावन हो सखिया। 

फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा 
उजर घर आँगन हो सखिया। 

अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा 
त खेत भइलें आपन हो सखिया।
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कौ ठगवा नगरिया लूटल हो।। टेक।।
चंदन काठ कै वनल खटोलना, 
तापर दुलहिन सूतल हो।। 1।।

उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, 
दुलहा मोसे रूसल हो।। 2।।
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