संपादकीय

ई देंह हऽ माटी के - प्रभुनाथ उपाध्याय जी


प्रभुनाथ उपाध्याय जी जिनिगी औरी समाज पर आपन कलम चलावे नी। उँहा के एगो कविता रउआँ सभे खाती.
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ई देंह हऽ माटी के

ई देंह हऽ माटी के
हऽ सरीर ई पानी के बुला
हवे पर मगर ई रसगुल्ला।
ई देंह हऽ माटी के॥

ई तऽ हिमालय से हवे बाड़ा
हीरा जवाहरातो से भी काड़ा
एमे तूफानो से बेसी बल बा।
ई देंह हऽ माटी के॥

ई तऽ पानी से भी गल जाला
गोली के आगे भी अड़ि जाला
औरी जाने का-का करि जाला।
ई देंह हऽ माटी के॥

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अंक - 1 (11 मई 2014)

2 टिप्‍पणियां:

  1. भैया आपका प्रयास बहुत नीक अ सराहनीय बा |आपके बहुत बहुत बधाई |अब हमहूँ भोजपुरी में थोड़ा बहुत लिखत बानी |

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    1. नमस्कार भाई जी। बहुत बढिया बात ब कि रउओं लिखेनी। हो सके तऽ आपन लिखल भेजीं।

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