मेलाघुमना - रघुनन्दन गोस्वामी

प्रथम पिता परमेसर का ध्यान धरि
लिखतानी सुनु चित लाय मेलाघुमना।
आवेला सिराती मेला, बदरी, मकर आदि
करे लागे आगे से तेयारी मेलाघुमना॥

मेलवा में जाये खातिर दूसरा से ऋण लेले
बाहर जैसे चलेले नवाब मेलाघुमना।
अधी, मखमल के तो कोट वो कमीज पहने
राह में चलले अठिलात मेलाघुमना॥

जाइ के दूकान पर पैसा के पान लेले
पैसा के बीड़ी हू त5 लेलऽ मेलाघुमना।
बीड़िया धराई जैसे मुँहवाँ में लूका लाई
इंजन के घुअबाँ डड़ावे मेलाघुमना॥

चार जाना आगे भइले, चार जाना पीछे भइले
मेलवा में करे गुण्डबाजी मेलाघुमना।
लाजो नाहीं लागे तोरा देसवा के चाल देखि
देसवा में भइले बदनास मेलाघुमना ॥

जइसन इजत तोरा घरवा के बाड़ी सब
वोइसन इजत संसार मेलाघुमना।
जहसन हाल होला धोबिया के कुकुरा के
नाहीं घर-घाट के ठिकान मेलाघुमना॥

अइहसने हाल होइ जाइ जब तोहर तब
तुहू रोइ करबऽ खयाल मेलाघुमना।
बार-बार बरजत बाड़न 'रघुनन्दन स्वामी”
उन्हकर घर बलिगाँव मेलाघुभना॥
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लेखक परिचय:-
नाम: रघुनन्दन गोस्वामी

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