जब रात में शहर के रोशनी एक-एक कऽ के जल उठेला तऽ लागेला कि धरती पर तारा उतर आइल होखे। हर फ्लैट के खिड़की से पीयर-पीयर रोशनी बाहर झरेला, आ दूर से देखीं तऽ लागे कि हर घर में जिनगी मुस्कुरा रहल बे। बाकिर ई मुस्कुराहट कइसन बा, ई तऽ हर दरवाजा के भीतर गइला के बादे बुझाला।
गुरुग्राम के एगो ऊँच टावर में, बारहवाँ मंजिल पर नेहा अपना पति के संगे रहत रहली। पति करण एक स्टार्टअप में काम करत रहलें। उनकरा जिनगी में रोज एगो नया सपना, रोज एगो नया दबाव रहे। जेवन एगो आदिमी सोच सकेला ऊ सभ सामान घर में रहे। जिनगी में आराम के केवनो कमी ना रहे।
बाकिर आराम कबो-कबो अइसन चुप्पी ले आवेला, जवन धीरे-धीरे आदमी के भीतर घुस जाला।
नेहा के आठ बरिस के बेटी रहे—तृषा। पहिले ऊ हरदम नेहा के गोद में लिपटल रहे। कहानी सुने के जिद करे। संगे खेले के जिद करे। सवाल पर सवाल कि मन उँजा जाए। नेहा के लगे कुछ सोचे भर के फुरसत ना रहे।
बाकिर अब तृषा तनि बड़ हो गइलि रहली, तऽ उनकर दुनिया बदल गइल रहे।
अब ऊ स्कूल से आके सीधे टैबलेट खोल लेस। कार्टून, गेम, वीडियो खेलला में घंटा पऽ घंटा बीत जाए, बाकिर ओकरा मूँह से केवनो आवाज ना निकले। तृषा के टैबलेट में एगो दुनिया बन गइल रहे। नेहा कई बेर देखस कि बेटी सोझा बइठल बे, बाकिर जइसे दूर कहीं भुला गइल बे।
“तृषा, चलऽ पार्क में चलल जा। खेलबु ना का?”
“हम ना जाइब मम्मा! अभी हमरा लेवल पूरा करे के बा।”
“ठीक बा चलऽ हम तोहके एगो कहानी सुनाइब। तोहरा तऽ बहुत नीक लागेला। आवऽ।”
“ना मम्मा! हम यूट्यूब पऽ देख लेइब।”
नेहा के लागल कि तृषा उनकरा से दूर हो गइल बे।
नेहा धीरे-धीरे तृषा से खेले भा कहानी सुने निहोरा कइल बन कऽ दिहली।
दूसरी ओर करण अपना सपना के पीछे भागत-भागत ई भुला गइल रहलें कि उनकरा घरो बा अउरी ओहू पऽ उनका धियान देबे के चाहीं।
जब नेहा तृषा के ले के कुछ कहस तऽ हँस के कह देस,
“आजकाल्ह के लइका-बच्चा अइसहीं हो गइल बाड़ें सऽ। डिजिटल जमाना बा। का करबु? अउरी जरूरीओ तऽ बा।”
नेहा सोचस, “जमाना बदल गइल, तऽ का हमनी के सभ भुला जाईं जा?”
एक रात में नेहा पानी पिए खातिर उठली। तृषा के कमरा से हलुक अंजोर आवत रहे। ऊ झाँक के देखली। तृषा स्क्रीन पऽ आँख गड़ले अंगुरी ऊपर-नीचे करत रहे।
“अबहीं ले जागल बाड़ू?” नेहा पूछली।
तृषा हरान हो के देखली। टैबलेट लुकवावे के परियास करत कहली,
“मम्मा! बस पाँच मिनट…”
नेहा कुछ ना कहली। बस ओकरा लगे बइठ गइल।
“का देखत बाड़ू?”
तृषा उत्साह से बतावे लागल। गेम, कैरेक्टर, पॉइंट्स, हार-जीत। आवाज में जान रहे, आँख में चमक एगो अलिगा चमक।
नेहा ध्यान से सुनत रहली। बहुत दिन बाद तृषा अइसन खुल के बोलत रहली।
ओह रात नेहा के नींद ना आइल। ऊ सोचत रहली—
“बच्चा दूर नइखे भइल… बस हमनी से अलग एगो दुनिया में चलि गइल बा।”
नेहा के बुझा गइल तृषा के जिनगी में एगो नया दुनिया बस गइल बे अउरी ओ दुनिया में नेहा के दुनिया केवनो स्थान नइखे।
दूसरका दिन, तृषा जब स्कूल से लौटल, तऽ मेज पऽ टैबलेट के जगह पऽ रंग-बिरंगा कागज, पेंसिल, आ छोट-छोट खिलौना रखल रहे। तृषा अजीब ढ़ंग से नेहा के ओर देखे लागल।
“आज हमनी कुछ नया खेलब जा,” नेहा कहली।
तृषा के मुँह उतर गइल,
“बोरिंग लागी मम्मा! प्लीज…”
“एक बेर ट्राई तऽ कर।”
तृषा मन मार के बइठ गइल अउरी अनमना के सगरी सामान उठा लिहलस। थोरी देर में तृषा कागज, पेंसिल आ रंग में डूब गइल।
कागज पर रंग चढ़े लागल, अउरी चित्र में कहानी उकरे लागल। एगो घर, एगो पेड़, एगो लइकी।
“ए लड़की के नाम का हऽ?” नेहा पूछली।
“तृषा,” हँस के कहली।
“आ ई पेड़?”
“ई हम घर के बाहर लगाइब।”
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लेखक परिचय:-
नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326
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