फुलेसर के बेटा के देखनहरू उनके भितरिहा टोह लेबे खातिर बुधन की दुकान पर जा के पहिले त बिना गरजे कई चीज के भाव पुछलें, फिनु बिना मन के दू-चार रूपिया के सामान कीनि के असली मुद्दा पर अइलें।
पुछलें- 'अच्छा भाई जी! ई बताईं, फुलेसर के जानिले?'
बुधन- 'ए में कवन पूछेवाली बात बा? ऊ त हमार जनमजात संघतिया हउअन। बड़ भाई हउअन। कहीं, कवन काम बा उनुका से?'
देखनहरू- 'काम त कवनो खास नइखे। अइसहीं उनुका बारे में कुछ जानल चाहत रहनीं हँ।'
बुधन- 'का जाने चाहऽतानीं? पूछीं। हमरा से ढेर उनुका बारे में के बताई? कहबे त कइनीं हँ कि लंगोटिया इयार हउअन।'
देखनहरू- 'तनी उहाँ का जगहि- जमीन का बारे में कुछ बताईं। केतना ले बा?'
बुधन- 'जगहि-जमीन का बारे में का पुछऽतानीं? जगहि-जमीन से केकर कवन काम चलऽता? माँटी ह, माँटिए रही। मजूरा के अकाल परल बा। जांगर धुनलो पर खाहूँ भर के अन्न नइखे होत। ऊपर से मलगुजारी दीं, तवन अलग। झंझट के पिटारा बा जमिनियो। का होई जमीन? के लादि के ले गइल बा कि फुलेसर भाई ले जइहें। इहे सब सोचिके ऊ आपन जमीन पहिलहीं हटावत गइलें आ हटाइयो दिहले बाड़ें। ना त रहे के त छब्बीस बिगहा जमीन रहल ह। अब छव कठ्ठा रखले बाड़ें। हमरे खेत का डाँड़े उनकरो खेतवा बा।'
देखनहरू के माथा घुमे लागल। पूछलें- 'त घर के खर्ची कइसे चलेला जी? जमीन सब ओराइए गइल बा।'
बुधन- 'बै महाराज! खर्ची के कवन कमी बा? हमार दुकान बड़ले बा। रोज आटा-चाउर आ जरूरत के सब सामान कीनि के जाला। पचीसन हजार ले के सामान ले गइल बाड़ें। का मजाल कि हम मांगहूँ जाईं। केहू से करजो ले के एक-दू महीना में देइए दिहें। कुछऊ कहीं, भयवा जबान के बड़ा पक्का ह। बाबुओ साहेब से एक लाख बियाज पर लिहले बाड़ें। गरज परी त अउर ले लिहें। लेकिन, केहू से लिहल पइसा घोंटि नइखन सकत। जीवट के अदिमी हउअन।'
एतना देर में देखनहरू फुलेसर का लरिका से अपनी बेटी के बिआह ना करे के मन बना लिहले रहलें। लेकिन, चलत- चलत पुछिए दिहलें- 'तनी भीतरिहो कुछ बताईं। मने, उहाँ के मलिकाइन कइसन सुभाव के हईं?'
बुधन- 'भाई के मलिकाइन त गाइ हई गाइ। केहू से कवनो रार ना तकरार। ऊ त फुलेसरे भाई कबो- कबो बाति ना मानेलें त दू-चार डंटा खींचि देली। एक्के हम बाउरो ना कहबि। रीसि-खीसि में केहू अइसन करि सकऽता। आजु बिहनवे त कुछ भइल ह। फुलेसर भाई पानी मंगले हँ। मलिकाइन कहली ह कि नल चला के ढोंकि लऽ। एम्मे कवनो बड़हन बात त रहल ह ना। भाई जद्दबद्द बोलि दिहले हँ आ ऊ चार-पाँच डंटा कसि दिहली ह। त एकरा के कवनो समसेया ना बनावे के। मरद- मेहरारू में ई सब होते रहेला।'
देखनहरू- 'भाई जी! बहुते धनिबाद। समय रहते सब बता दिहनीं। अच्छा, अब चलऽतानीं। लामे जाए के बा।'
बुधन- 'आरे! तनी रूकीं ना। ई सब काहे पूछत रहनी़ हँ? लइकी के बिआह-ओआह नइखे नू करे के उनुका लरिका से?'
देखनहरू- 'कुछ अइसने बात रहल ह।'
बुधन- 'त बिआह करीं ना। ठीके त बा। एकदम टंच। लइकी सुख में रही।'
देखनहरू- 'हँ, मने काहें ना। एकरा से नीमन घर कहाँ भेंटाई? अनजान जगहि का अनजान अदिमी से रउरा मजाक ना करबि त केकरा से करबि? चलीं, मजाक कइए दिहनीं त लरिका का रहनि- सुभाव का बारे में कुछ बताईं।'
बुधन- 'देखीं हम मजाक नइखीं करत रउरा से। हम बिआह लगाईं ना त कटबो ना करिले। लरिका का बारे में कुछ नइखे पूछे के? एगो लरिका बा। घर के रतन। सामाजिक एक नमर के। घरे कबो रहिए नइखे सकत। जवार भर का नवछेड़ियन से इयारी बा। दिनभर ओही कुल्हिन का साथे बिता देला। साँझिए का बेरा घर- परिवार में कबो टिन्नफिन्न करेला। फुलेसर भाई बड़ा नू बरदासी हउअन जी। संघत- सोरकार में पी पा के लरिकवा दू-चार चटकन चलाइयो देला, तब्बो दम्मी साधि ले लें। रउरे बताईं कि ए जुग-जमाना में अइसन परिवार मिलल मस्किल बा कि ना? त, हम त कहबि कि रउरा खूब धूमधाम से बिआह करीं। लइकी चैन से रही।'
देखनहरू- 'ठीक बा सरकार। हम आ गइल बानीं त अब रिगाईं जनि। राउर भाखा हम समुझत बानीं। रउरा चाहत बानीं तवने होई। अब लवटि के ना आइबि। धनिबाद रउरा के। हँ, बाकी जवना गाँव में रउरा जइसन लोग होई, ओ गाँव के लरिका लो का जिनिगी भरि बंठे रहे के परी।'
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प्रधान सम्पादक, सिरिजन, भोजपुरी पत्रिका।
मुसेहरी बाजार, गोपालगंज, बिहार।
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