धरती अकास आजु मिले गरवा डार
कतहीं मिले ना सँवरिया हमार, सखिया!
थाके रहिया निहार दूनो अँखिया उघार
नाही आवे निरमोहिया हो मोरे रखवार
उठे जीयरा में पीर, बरिसे नैनवाँ से नीर,
जइसे रिमि-झिमि बरिसे फुहार, सखिया!
कतहीं मिले ना…
फूल बगिया बयरिया हो नाही मँहके
आजु मनवाँ के पनछी हो नाहीं चहके
जियरा लागे नाहीं मोर, नेहियाँ पाये बिनु तोर,
जइसे बाजे बिनु तार ना सितार, सखिया!
कतहीं मिले ना…
हँसि उठेला बिपतिया क आन्हीं आ तुफान
मन डगमग डोले, आजु डोलेला परान
केहू होला ना हमार, मिले नाहीं खेवनहार,
नइया बहे जइसे बिनु पतवार, सखिया!
कतहीं मिले ना…
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लेखक परिचय:-
नाम: भोलानाथ गहमरी
जन्म: 19 दिसंबर 1923
मरन: 2000
जन्म थान: गहमर, गाजीपुर, उत्तरप्रदेश
परमुख रचना: बयार पुरवइया, अँजुरी भर मोती और लोक रागिनी

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