कहीं जीत कहीं हार - भोलानाथ गहमरी

गीत जिनिगी के छन-छन, निहार लिखली,
जवन पवलीं अँजोर या, अन्हार लिखलीं।

केतने गुजरल ना जाने तपन जेठ के,
केतने सावन के रिम-झिम फुहार लिखलीं।
जवन पवलीं…

कहीं डगमगाति नाव के किनारा मिलल,
कहीं डूबत भँवर, मजधार लिखलीं।
जवन पवलीं…

पार केतने भइल ऊँच-खाल रहिया,
एक बहुते चढ़ाव, एक उतार लिखलीं।
जवन पवलीं…

बाते-बाते खनक जो गइल हाथ के,
कतहीं कँगना त कतहीं, कटार लिखलीं।
जवन पवलीं…

रंग बदलल जो मौसम कइक रूप में,
कबहूँ पतझर त कबहूँ, बहार लिखलीं।
जवन पवलीं…

फैसला हो सकल ना जमाना से,
हर कदम कहीं जीत, कहीं हार लिखलीं।
जवन पवलीं…
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लेखक परिचय:-
जन्म: 19 दिसंबर 1923
मरन: 2000
जन्म थान: गहमर, गाजीपुर, उत्तरप्रदेश
परमुख रचना: बयार पुरवइया, अँजुरी भर मोती और लोक रागिनी

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